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  • 16
  • मार्च

आज के समय में अधिकतर माता-पिता की यही शिकायत होती है कि बच्चे उनकी बात ही नहीं सुनते। वह हमेशा अपने मन की ही करते हैं या फिर छोटी-छोटी बातों पर जिद करते हैं। जिसके कारण माता-पिता को काफी परेशानी होती है। इस स्थिति से निपटने के लिए या तो माता-पिता उनकी बात मान लेते हैं या फिर उन पर गुस्सा करने लग जाते हैं। इसे किसी भी लिहाज से उचित नहीं माना जाता क्योंकि एक समय के बाद बच्चों पर उनका भी असर नहीं होता। ऐसे में जरूरी है कि आप कुछ आसान टिप्स अपनाएं। तो चलिए जानते हैं इसके बारे में-

 

बदले अपना व्यवहार

 

अक्सर देखने में आता है कि माता-पिता बच्चे के व्यवहार में अनुशासन देखना चाहते हैं, जबकि उनके खुद के व्यवहार में ही अनियमितता होती है। कभी ऐसा होता है कि अभिभावक आॅफिस के काम या अन्य किसी परेशानी के चलते स्ट्रेस में होते हैं, तो वह अनायास ही बच्चे पर अपना गुस्सा निकाल देते हैं। ऐसा भूल से भी न करें। बच्चे को अनुशासित करने से पहले माता-पिता अपने व्यवहार को अनुशासित करें। आप चाहें माने या न मानें, बच्चे अभिभावकों की बातों से ज्यादा उनके द्वारा किए गए कार्य को नोटिस करते हैं और उसी का अनुसरण भी करते हैं। उदाहरणस्वरूप, अगर आपको टीवी देखने की लत है तो आप चाहकर भी बच्चों को टीवी से दूर नहीं रख सकते है। अगर आप बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित करना चाहते हैं तो पहले खुद पर अंकुश लगाना सीखें। जब आपका व्यवहार अनुशासित होगा तो बच्चे भी खुद-ब-खुद आपकी नकल करने लगेंगे। उसके बाद बच्चे को समझाना या अनुशासित करना आपके लिए कठिन नहीं होगा।

 

न करें अपमानित

 

बच्चों को अनुशासित करने या फिर उनसे अपनी बात मनवाने से पहले उनके मनोविज्ञान को समझना बेहद आवश्यक है। जिस प्रकार अगर आपको कोई व्यक्ति कुछ कह देता है तो आपको काफी बुरा व अपमानित महसूस होता है, ठीक वैसा ही बच्चे के साथ भी होता है। अगर बच्चे द्वारा कोई गलती करने पर अगर आप उसे सार्वजनिक स्थान जैसे पार्क या माॅल आदि में उस पर चिल्लाते या गुस्सा करते हैं तो इससे बच्चा काफी नाराज हो जाता है। उसके बाद बच्चा बिल्कुल भी आपकी बात नहीं सुनता। जब पब्लिक प्लेस पर अनजान लोगों के सामने आप बच्चे पर चिल्लाते हैं तो बच्चा आप क्या कह रहे हैं इस बात पर फोकस नहीं करता बल्कि बल्कि वह इस बात से परेशान हो जाता है कि आसपास के लोग आपकी बातें सुन रहे हैं। इसलिए अगर बच्चा कोई गलती करता है तो सबसे सामने पर उस पर चिल्लाने की बजाय घर आकर उसे प्यार से समझाएं कि उसके द्वारा की गई हरकत आपको अच्छी नहीं लगी और आप उम्मीद करती हैं कि बच्चा वह गलती दोबारा नहीं दोहराएगा।

 

करते रहें प्रेरित

 

बच्चों की एक आदत होती है कि वह कोई भी कार्य तब तक करने के लिए तैयार नहीं होते, जब तक उन्हें उसके लिए एक वाजिब वजह न मिले। यही वजह उनके लिए अमुक कार्य को करने के लिए प्रेरणास्त्रोत बनती है। इसलिए माता-पिता का यह फर्ज है कि बच्चे से अपनी बात मनवाने के लिए उसे प्रोत्साहित अवश्य करें। इसके लिए आप चाहें तो उसके साथ मिलकर कोई एक्टिविटी कर सकते हैं। मसलन, अगर आप चाहते हैं कि बच्चों में रीडिंग हैबिट डेवलप हो तो उसके लिए बजाय उसे किताब देने के कहें कि अब से आप हर रात मिलकर एक स्टोरी पढ़ेंगे। इससे यकीनन उसे पढ़ने में मजा आएगा और पढ़ना उसकी आदत बन जाएगा। ठीक इसी तरह, बच्चे को रिवाॅर्ड देकर भी प्रोत्साहित किया जा सकता है। लेकिन इसका तरीका सही होना चाहिए। मसलन, अगर बच्चा कोई अच्छा कार्य करता है तो आप उसे उसकी कोई मनपसंद चीज या एक छोटी सी आईसक्रीम पार्टी दे सकते हैं। लेकिन उसे कभी भी बच्चे को घूस देने की कोशिश करें। बच्चे से काम करवाने का यह तरीका भले ही आपको आसान लगता हो लेकिन बाद में यह उसकी आदत में शुमार हो जाएगा। इतना ही नहीं, बच्चा अगली बार काम करने के लिए पहले किसी उपहार की डिमांड करेगा। इस तरह उसके भीतर एक तरह से दूसरों को ब्लैकमेल करने की प्रवृत्ति का विकास होगा, जो उसके लिए किसी भी लिहाज से उचित नहीं है।

 

जरूरी है आपसी विश्वास

 

किसी भी रिश्ते की मजबूती के लिए आपसी विश्वास का होना बेहद आवश्यक है, फिर चाहे बात आपके और बच्चे के रिश्ते की ही क्यों न हो। जब रिश्ते में आपसी विश्वास होता है तो आपको बच्चे को अनुशासित करने के लिए डांटने, मारने या फिर गुस्सा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अगर बच्चा आप पर विश्वास करने लगेगा तो बिना डरे अपने मन के सभी भावों को आपको बता पाएगा, जिससे आपको उसकी क्षमताओं व कमजोरियों का बेहद आसानी से पता लग जाएगा और आप उस पर काम कर सकते हैं। वहीं आपसी विश्वास के चलते बच्चा अपने माता-पिता की बात भी उतने ही धैर्यपूर्वक सुनता, समझता व उसका पालन करता है। अगर आप बच्चे को यह विश्वास दिलाते हैं कि आप बच्चे पर बहुत अधिक भरोसा करते हैं और वह ऐसा कुछ नहीं करेगा, जिससे आपको दुख हो। आपका यह छोटा सा कदम उसे किसी भी तरह का गलत व्यवहार करने से रोकेगा।

 

उम्र का ख्याल

 

एक गलती अक्सर हर पैरेंट्स करते हैं, वह बच्चों से परफेक्शन की उम्मीद रखते हैं। लेकिन बच्चों व बड़ों की उम्र में काफी अंतर होता है और इसलिए वह उस तरह व्यवहार नहीं कर सकते, जैसा आप उनसे अपेक्षा करते हैं। भले ही बच्चा कितना भी अच्छा या अनुशासित हो लेकिन कभी न कभी ऐसा भी होगा कि वह आपसे जिद करेंगे या फिर अनुशासन तोड़ेंगे। लेकिन उस स्थिति में जरूरत से ज्यादा रिएक्ट न करें और न ही बच्चों से नकारात्मक बातें कहें। बल्कि जहां तक हो सके, स्वयं के व्यवहार को संयमित रखें। साथ ही उन्हें यह समझाएं कि उसके इस व्यवहार से आपको काफी बुरा लगा है। साथ ही उससे यह वादा लें कि वह अगली बार ऐसा नहीं करेगा। इस तरह बच्चा बिना गुस्सा किए बिना भी अनुशासन में रहना सीख जाता है। हालांकि बच्चे के व्यवहार में परिवर्तन के लिए धैर्य, प्रेम व भरोसा दिखाना बेहद आवश्यक है।

  मिताली जैन

 

  • 13
  • मार्च

जैसलमेर। जिले में लोकसभा आम चुनाव-2019 को मध्य नजर रखते हुए जिला मजिस्ट्रेट एवं जिला निर्वाचन अधिकारी (कलक्टर) नमित मेहता ने एक आदेश जारी कर जैसलमेर जिले की राजस्व सीमाओं में शांतिपूर्वक, स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं सुव्यवस्थित ढंग से चुनाव सम्पन्न कराने के लिए निषेधाज्ञा लागू की है, ताकि जिले के सभी शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों एवं सभी वर्गों के मतदाता, विषेषकर कमजोर वर्ग के मतदाता बिना किसी भय के अपने संवैधानिक मतधिकार का उपयोग कर सकें। यह आदेश तत्काल लागू होकर आगामी आदेश तक प्रभावी रहेगा। इस निषेधाज्ञा की अवहेलना या उल्लंघन भारतीय दण्ड संहिता की धारा 188 के तहत दण्डनीय है।

जिला निर्वाचन अधिकारी (कलक्टर) मेहता द्वारा जारी किए गए आदेष के अनुसार इस दौरान जिले की राजस्व सीमाओं के भीतर सम्पूर्ण क्षेत्र में कोई भी व्यक्ति किसी भी प्रकार का विस्फोटक पदार्थ, रासायनिक पदार्थ, आग्नेय अस्त्र-शस्त्र, जैसे- रिवाल्वर, पिस्टल, बंदूक, एम.एल गन, बी.एल. गन, आदि एवं अन्य हथियार जैसे गण्डासा, फर्सी, तलवार, भाला, कृपाण, चाकू, छुरी, बर्छी, गुप्ती, कटार, धारिया, बाघनखा जो किसी धातु के शस्त्र के रूप में बना हो आदि तथा विधि द्वारा प्रतिबन्धित हथियार और मोटे घातक हथियार-लाठी आदि सार्वजनिक स्थानों पर धारण कर न तो घूमेगा, और न ही प्रदर्शन करेगा और न ही साथ में लेकर चलेगा।

उन्होंने बताया कि यह आदेश ड्युटी पर तैनात सीमा सुरक्षा बल, राजस्थान सशस्त्र पुलिस बल, राजस्थान सिविल पुलिस, चुनाव ड्युटी में तैनात अर्द्धसैनिक बल, होमगार्ड एवं चुनाव ड्युटी में मतदान दलों में तैनात अधिकारियों, कर्मचारियों पर लागू नहीं होगा। उन्होंने बताया कि जैसलमेर जिले से बाहर का कोई भी व्यक्ति जिले की सीमा में इस प्रकार के हथियारों को अपने साथ नहीं लायेगा, ना ही सार्वजनिक स्थानों पर प्रयोग या प्रदर्शन करेंगा। परन्तु वे व्यक्ति जो निःषक्त अथवा अतिवृद्व है और जो लाठी के सहारे के बिना नहीं चल सकते है वे लाठी का प्रयोग सहारे के रूप में कर सकेगें साथ ही सिख समुदाय के व्यक्तियों को उनकी धार्मिक परम्परा के अनुसार नियमान्तर्गत कृपाण रखने की छूट रहेगी। यह आदेष पर्वो के दौरान सक्षम स्वीकृति के तहत आयोजित धार्मिक समारोह, जुलूसों व कार्यक्रमों पर लागू नहीं होगा।
आदेष के अनुसार कोई भी व्यक्ति संबंधित उपखण्ड मजिस्ट्रेट की स्वीकृति के बिना किसी भी सार्वजनिक स्थल पर कोई भी जुलूस, सभा, धरना, भाषण आदि का आयोजन नहीं करेगा एवं न ही संबंधित उपखण्ड मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति के बिना ध्वनि प्रसारण यंत्र का प्रयोग किया जावेगा। आदेष के अनुसार कोई भी व्यक्ति सांप्रदायिक सद्भावना को ठेस पहुंचाने वाले तथा उत्तेजनात्मक नारे नहीं लगायेगा, न ही ऐसा कोई भाषण और उद्बोधन देगा, न ही ऐसे किसी पम्पलेट, पोस्टर या अन्य प्रकार की चुनाव सामग्री छापेगा या छपवाएगा, वितरण करेगा या करवायेगा और न ही किसी एम्प्लीफायर, रेडियो, टेपरिकार्डर, लाउडस्पीकर, ऑडियो-वीडियो कैसेट या अन्य किसी इलैक्ट्रानिक उपकरणों के माध्यम से इस प्रकार का प्रचार-प्रसार करेगा अथवा करवाएगा, और न ही ऐसे कृत्यों के लिए किसी को दुष्प्रेरित करेगा। इस दौरान कोई भी व्यक्ति किसी भी सार्वजनिक स्थान पर मदिरा का सेवन नहीं करेगा, न ही अन्य व्यक्ति को सेवन करवायेगा तथा अधिकृत विक्रेताओं के छोडकर कोई भी व्यक्ति निजी उपयोग के कारण को छोडकर किसी अन्य उपयोग के लिए सार्वजनिक स्थलों में से मदिरा लेकर आवागमन नहीं करेगा।

आदेश के अनुसार कोई भी व्यक्ति या संस्था इन्टरनेट तथा सोशल मीडिया यथा फेसबुक, ट्विटर, वाट्सएप, यूट्यूब, आदि के माध्यम से किसी प्रकार का धार्मिक उन्माद, जातिगत द्वेष या दुष्प्रचार नही करेगा। कोई भी व्यक्ति किसी के समर्थन या विरोध में सार्वजनिक एवं राजकीय सम्पतियों पर किसी तरह का नारा-लेखन या प्रति-चित्रण नहीं करेगा, ना ही करवाएगा और न ही किसी तरह के पोस्टर, होर्डिंग आदि लगाएगा, और न ही सार्वजनिक सम्पतियों का विरूपण करेगा या करवायेगा। किसी भी निजी सम्पति का उक्त प्रयोजनार्थ उपयोग उसके स्वामी की लिखित पूर्वानुमति के बिना नहीं किया जा सकेगा। यह आदेष मतदान समाप्ति से 48 घण्टे पूर्व यानि 27 अप्रैल को सांय 5 बजे के पष्चात 5 से अधिक व्यक्तियों द्वारा एक साथ घर-घर जाकर जनसम्पर्क करने के संबंध में प्रभावी नही होगा। किसी भी मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारा, गिरिजाघरों या अन्य धार्मिक स्थानांे का चुनाव प्रचार के मंच के रूप में प्रयोग नहीं किया जावेगा। आदेष की अवहेलना करने वाले व्यक्ति अथवा व्यक्तियों पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 188 के अन्तर्गत अभियोग चलाया जाएगा।

  • 19
  • अक्टू

ब्यावर, (हेमन्त साहू)। ब्यावर क्षैत्र का टॉडगढ उपखंड पहाड़ों के बीच बसा एक सुंदर कस्बा है। टॉडगढ़ के प्रज्ञा शिखर पर खडे होकर देखने से कई किलोमीटर दूर तक रावली का नजारा देखा जा सकता है। आज भी पर्वतीय ढलानों पर छोटे छोटे कच्चे लिपे पुते घर दिखाई दे जाते हैं। गांव की बसावट इस प्रकार से की गई है कि बारिश के दौरान यहां कीचड नहीं होता। ये राजस्थान का नया उपखंड है। प्राचीन बरसावाडा में राजस्थानी इतिहास पर शोध कर लिखने वाले पहले लेखक कर्नल जेम्स टॉड के नाम पर 1821 में टॉडगढ़ नाम दिया गया।  बरसावाडा बना टॉडगढ:- बरसावडा की स्थापना करीब 1 हजार साल पूर्व की गई थी। जब यहां घना जंगल था और यहां सिर्फ जंगली जानवर बसेरा करते थे। कहा जाता है कि बरसा गुजर नाम के एक पशुपालक द्वारा यहां पशु चराए जाते थे। इससे इस क्षेत्र को बरसावाडा कहा जाने लगा। बरसा गुजर की पत्नि चैना गुजरी की ओर से यहा पर बनाया गया देवजी का देवरा आज भी टॉडगढ़ में मौजूद है। बाद में मेर जाति के लोग भी यहां पर आए। परिस्थतिवश मेर जाति का मूल व्यवसाय डाका डालना और चोरी करना बन गया। बाहुबल और छदम युद्ध पद्वति के कारण इस क्षेत्र में मेर जाति का दबदबा हो गया और गुजर लोग यहां से पलायन कर गए। मेर जाति के आतंक के कारण उदयपुर और जोधपुर के तत्कालीन शासकों ने अंग्रेजों से समझौता कर लिया। जिस कारण इस क्षेत्र में मेर जाति के आंतक पर अंकुश लगाने के मकसद से ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से कर्नल जेम्स टॉड को 1821 में बरसावाडा आए और मेर जाति के आंतक से क्षेत्र को मुक्त करवाया। जिससे उदयपुर के तत्कालीन महाराणा भीमसिंह ने बरसावाडा को टॉडगढ़ नाम दिया। 

  • 29
  • सित

बागपत 29 सितम्बर। रावण शब्द सुनते ही मन में खलनायक की छवि उभरती है। दशहरे के दिन बुराई का प्रतीक बताकर दशानन का पुतला भी फूंका जाता है, लेकिन बागपत जिले के रावण गांव के ग्रामीण लंकेश के प्रति अपार श्रद्धा रखते हैं। सदियों से यहां रावण की पूजा की जाती है। गांव में न तो रामलीला होती और न ही रावण का पुतला फूंका जाता। रावण का इस गांव से गहरा नाता रहा है।

दिल्ली-यमुनोत्री हाईवे पर पाठशाला चौराहे से 11 किमी दूर रावण उर्फ बड़ा गांव पुरातत्व और धार्मिक दृष्टिकोण से खासा महत्व रखता है। किवदंति, अवशेष, सैकड़ों साल पुरानी मूर्तियां और मंदिर इस गांव को सुर्खियों में बनाए रखते हैं। बताते हैं कि लंकाधिपति रावण यहां आया था। मंशादेवी मंदिर के पुजारी रमाशंकर तिवारी के अनुसार, रावण हिमालय से मंशा देवी की मूर्ति लेकर गुजर रहा था। रावण उर्फ बड़ा गांव के पास उसे लघुशंका लगी। मूर्ति रखकर वह लघुशंका चला गया।

मूर्ति स्थापना को लेकर विशेष शर्त थी कि पहली बार मूर्ति जहां रखी जाएगी वहीं स्थापित हो जाएगी। इस कारण मां की मूर्ति इस गांव में स्थापित हो गई। रावण ने मूर्ति स्थापित होने के बाद यहां एक कुंड खोदा और उसमें स्नान के बाद तप किया। इस कुंड का नाम रावण कुंड है। कहा जाता है कि रावण के समय का मां मंशा देवी का मंदिर अभी भी गांव में स्थापित है। इसी किवदंति के चलते इस गांव का नाम रावण पड़ गया। राजस्व अभिलेखों में भी इस गांव का नाम रावण उर्फ बड़ा गांव दर्ज है।

गांव के निवासी व शोधकर्ता कुलदीप त्यागी बताते हैं कि किवदंतियों और खुदाई में मिले प्रमाणों के अनुसार ऐसी पुष्टि होती है कि रावण ने यहां पर मंशा देवी मंदिर की स्थापना की। इसी आधार पर गांव को रावण नाम का दर्जा प्राप्त है। ग्रामीण रावण को गांव का संस्थापक मानकर उन्हें पूजते हैं।

रावण गांव ऐतिहासिक धरोहरों के नजरिए से भी काफी महत्वपूर्ण है। यहां सिद्ध पीठ मंदिर में भगवान विष्णु की दशावतार मूर्ति है। पुरातत्वविद इस मूर्ति को सातवीं शताब्दी की बताते हैं। मंदिर में प्राचीन स्तंभ और अन्य मूर्तियां अजंता एलोरा जैसी प्रतीत होती हैं। गांव में कई जैन मंदिर स्थापित हैं। दुनियाभर से जैन समाज के लोग यहां स्थित त्रिलोकतीर्थ मंदिर के दर्शन के लिए आते हैं।

विकट विद्वान रावण ने कभी भी महिलाओं से अमर्यादित आचरण नहीं किया। मां सीता से भी वह सदैव मर्यादा में रहे। सभी ग्रामीण रावण की अच्छाइयों को ग्रहण करने और उनका अनुसरण करने की कोशिश करते हैं। गांव में कभी रामलीला का आयोजन नहीं होता। न ही उनका पुतला फूंका जाता है।
मथुरा: शनिवार को विजयादशमी पर देशभर में रावण के पुतले का दहन किया जाएगा, लेकिन शुक्रवार को भगवान श्रीकृष्ण की नगरी में लंकेश्वर की महाआरती कर पूजा-अर्चना की जाएगी। यहां के रावण भक्त हर वर्ष होने वाले पुतला दहन का कई वर्ष से विरोध कर रहे हैं। रावण की पूजा कर भी वह यही संदेश देना चाहते हैं। लंकेश भक्त मंडल रावण का पूजन करने की तैयारी कर रहा है।

यमुना पर होनेे वाली पूजा में रावण के जयघोष गूंजेंगे। शुक्रवार दोपहर दो बजे यहां रावण भक्त एकत्रित होंगे। मंडल के संस्थापक ओमवीर सारस्वत ने बताया कि इस दौरान महाआरती होगी और विविध प्रकार के भोग लंकापति को अर्पित किए जाएंगे। लंकेश महोत्सव में सारस्वत अर्थात रावण के वंश के लोगों के अलावा अन्य वर्ग के लोग भी शामिल होते हैं।

 

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