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  • 24
  • सित

नई दिल्ली। औषधीय गुणों से भरपूर नीम न केवल मानव जीवन के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि यह पशुओं, कृषि, पर्यावरण और उद्योगों की आवश्यकताओं को भी पूरा करता है। इसी के मद्देनजर इंडियन फारमर्स फर्टिलाइजर कोआपरेटिव (इफको) ने व्यापक पैमाने पर इसके पेड़ लगाने का अभियान शुरु किया है ।

नीम की पत्ती और बीज एन्टीसेप्टिक,एन्टीवायरल,एन्टीपायरेटिक,एन्टी अल्सर और एन्टी फंगल होते हैं जो सीधे तौर पर मानव स्वास्थ्य से जुड़ा है। इसे ध्यान में रखते हुए सहकारिता क्षेत्र की दिग्गज कम्पनी इफको ने न केवल देश भर में नीम के ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने बल्कि इस पर शोध कराने का फैसला किया है।

इफको के प्रबंध निदेशक उदय शंकर अवस्थी ने बताया कि देश के विभिन्न हिस्सों में पिछले वर्ष नीम के 13 लाख पौधे लगवाए गए थे और इस वर्ष इसके 26 लाख पौधे लगाए जा रहे हैं। उन्होंने नीम की एक ऐसी किस्म विकसित की गयी है जिसमें निमौली पांच छह वर्ष में लगनी शुरु हो जाती है जबकि इससे पहले नीम के पेड़ में दस साल में फल लगने शुरु होते थे। 

उन्होंने कहा कि दुनिया में बदलाव आ रहा है और लोग रसायन को छोड़कर जैविक उत्पादों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। तापमान में वृद्धि हो रही है और पर्यावरण में बदलाव आ रहा है जिसके कारण वह नीम पर शोध को बढ़ावा दे रहे हैं । नीम पर शोध के लिए कम्पनी ने देहरादून स्थित वन शोध संस्थान के साथ करार भी किया है ।-एजेंसी 

  • 24
  • सित

नई दिल्ली। क्या आपको मालूम है कि जिस देवनागरी लिपि में आज आप हिन्दी लिखते और पढ़ते हैं, उसके लिए अठारहवीं सदी के अंत से लेकर बीसवीं सदी तक लम्बा आन्दोलन चला था। इसकी शुरूआत सर विलियम जोंस के वर्ष 1784 में प्रकाशित एक लेख से हुई थी तथा ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक मई 1793 में इस लिपि को पहली बार अपनाया था।

यह शोधपूर्ण तथ्य पहली बार प्रामाणिक रूप से देवनागरी लिपि आन्दोलन का इतिहास नामक पुस्तक में सामने आया है, जिसे साहित्य अकादमी ने प्रकाशित किया है । बिहार विश्वविद्यालय (मुजफ्फरपुर ) में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त डॉ रामनिरंजन परिमलेंदु द्वारा लिखित इस पुस्तक का लोकार्पण हाल ही में भारतीय सामाजिक विज्ञान संस्थान के अध्यक्ष बी बी कुमार ने किया ।

सात सौ 56 पृष्ठों के इस शोधपरक ग्रंथ से पता चलता है कि देवनागरी लिपि को राजकीय स्तर पर अपनाने के लिए उस ज़माने में लेखकों, पत्रकारों तथा हिन्दीसेवियों को लम्बा संघर्ष करना पड़ा क्योंकि अंग्रेज सरकार के हिमायती रोमन लिपि में ही हिन्दी को लिखे जाने के समर्थक थे तो कई फारसी लिपि के समर्थक थे और कई राजनीतिज्ञ उर्दू लिपि में हिन्दुस्तानी लिखे जाने के हिमायती थे ।

डॉ परिमलेंदु के अनुसार एशियाटिक सोसिएसिटी ऑफ कोलकत्ता के संस्थापक अध्यक्ष सर विलियम जोंस के 1784 एक लेख से देवनागरी लिपि के आन्दोलन का प्रारंभ हुआ था क्योंकि जोंस ने इस लिपि को अन्य लिपियों की अपेक्षा श्रेष्ठ माना था लेकिन खुद सम्पूर्ण एशियायी भाषाओं के लिए रोमन लिपि को ही मान्यता दी थी। ईस्ट इंडिया कंपनी शासन का संविधान एक मई 1793 में लागू हुआ, जिसके प्रथम अनुच्छेद की तृतीय धारा में देवनागरी लिपि को सरकारी स्वीकृति प्राप्त हुई ।-एजेंसी 
 

 
  • 01
  • मई

वाशिंगटन, 01 मई  जानवरों के शिकारियों और परभक्षियों से बचने के लिए मरने का नाटक करने के बारे में तो हम सब जानते हैं लेकिन क्या कभी आपने सुना है कि कोई प्राणि अपनी प्रजाति के नर को दूर भगाने के लिए यह रास्ता अपनाता है। नहीं न, तो हम बताते हैं कि ऐसा एक प्राणि है और वह है-मादा ड्रैगन फ्लाई ( ब्याध पतंग) जो अपनी प्रजाति के नर को दूर भगाने के लिए मृत होने का नाटक करती है।
इकोलॉजिकल सोसायटी ऑफ अमेरिका में पेश किये गये नये अध्ययन के मुताबिक मादा ड्रैगनफ्लाई अवांछित नरों से खुद को बचाने के लिए अचानक जमीन पर गिरकर मरने का नाटक करती है। उनकी इस हरकत से नर को लगता है कि वह मर चुकी है और वह उसके पास से चला जाता है। अध्ययन के मुताबिक 31 में से 27 ड्रैगन फ्लाई ने ऐसा किया और इनमें से 21 अपने मकसद में कामयाब भी रहीं।


  • 19
  • अप्रै

नई दिल्ली: आपने अभी तक बारात के वापस होने के कई कारण सुने होंगे लेकिन क्या आपने कभी सुना कि एक रसगुल्ले के कारण बारात बिना दुल्हन के लौट गई? नहीं ना, पर यह सच है। मामला उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात का है, जहां पर सिर्फ एक रसगुल्ले के कारण पूरी बारात वापस चली गई।

दरअसल खाने के दौरान प्लेट में रसगुल्ले रखने की बात पर विवाद इतना गहरा गया कि बारातियों और घरातियों में मारपीट हो गई। जिसके बाद लड़की ने शादी से इंकार कर दिया और बारात को बैरंग लौटना पड़ा।

कानपुर देहात के गांव कुरमापुर में उन्नाव के अचलगंज थाना क्षेत्र के खुटहा गांव से बारात आयी थी। इसी दौरान जब बाराती खाना खा रहे थे तो लड़के के मौसेरे भाई ने प्लेट में 2 रसगुल्ले रख लिए जिस पर स्टॉल पर खड़े लड़के ने एक रसगुल्ला रखने को कहा। बस इसी बात पर विवाद इतना बढ़ा कि दोनों पक्षों में मारपीट हो गई।

इस बीच लड़के पक्ष की ओर से लड़की के पिता के साथ भी गाली गलौज की गई। और जब इस घटना के बारे में लड़की को पता चला तो उसने शादी से ही इंकार कर दिया।

घटना के बाद गांव के बड़े बुजुर्गों और पुलिस ने दोनों पक्षों को समझाने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बन पायी। इसके बाद बारात को बिना दुल्हन के ही बैरंग लौटना पड़ा।