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  • 14
  • जन

बन पतंग की डोरी
खींची चली आऊँगी
लाल हरी नीली पीली
पतंगों के बीच गगन
में उड़ खूब इतराऊँगी

पतंग की डोर सी
प्रीत मेरी है पिया
जो दूर आसमां में
मुझे तुझसे मिलाएगी

देख हरी पतंग मुझे
आज मुस्कराई है
छोड़ के जमीं को
आसमा में छाई है

मैं भी उड़ती रही
पीछे -पीछे हरी के
आखिर मुझे आना है
बन के उसकी छाया

डॉ मधु त्रिवेदी
सर्वाधिकार सुरक्षित

  • 12
  • जन

शायद मैं भी नही जानती
कंही तो कुछ ऐसा है जो
मैं भी समझ नही पा रही
मै कुछ लिखना चाहती हूं
पर लिखने को शब्द
नही मिल रहे
लगता है कंही खो गए हैँ
मेरे शब्द
खुद को अभिव्यक्त
करने के लिए मुझे मेरे शब्दों को
ढूंढना ही होगा

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अक्सर एक अंतर्द्वन्द्व सा
महसूस करती हूं अपने अंदर
कुछ घुटन सी महसूस होती है
मानो मेरे शब्द बाहर आने
के लिए छटपटा रहे हों
अगर बाहर न आ सके
तो मेरे शब्द मर जाये गें
फिर कैसे जुबां दूंगी अपने
मनोभावों को
चाहकर भी खुद को बचा न सकूँगी
इतनी घुटन क्यों हो रही है 

मै तो सिर्फ खुद को
पहचान देना चाहती हूं
पर कैसे नही जानती
लिखना चाहती हूँ खुद को
व्यक्त करना चाहती हूँ
पर कैसे नही जानती
मुझे खुद को तलाशना है जो रिश्तों
की भीड़ में कंही खो गई है
खुद को पहचान दिलानी है
इसके लिए अपने कदमो के तले
की जमीं को तैयार करना होगा

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खुद के लिए राह तलाशनी होगी
सारी जिंदगी बेटी बहन पत्नी और माँ
बनकर ही तो जीती रही हूं
अब मै खुद के लिए जीना चाहती हूं
क्या ये सम्भव हो सकेगा
"कौन हूं मै"
क्या इसका जवाब मिल सकेगा
"क्या पहचान है मेरी"
.......कुछ भी तो नहीं
रिश्तों की भीड़ में कंही खो गया है
"मेरा अस्तित्व"
मुझे "मेरी पहचान" वापिस चाहिए
......क्या मिल सकेगी मुझे
मेरी पहचान...???
 
रश्मि डी जैन
महसचिव, आगमन साहित्यक समूह
नई दिल्ली
  • 12
  • जन

बिन पिया बैरिन भई सब रातें
किसे बुलाऊँ सौतन भई सब बातें
हेर - हेर देखत कब आये प्राण प्यारा
बिन उसके हाड़ माँस सूख भए खाँचे

पिया गया परदेश न भेद काहूँ को दूँ
सखिन मेरी सब प्रिय के रंग - राती
कोऊँ ठौर न आवे बस मन मेरो दग्धावे
जे भँवरो रोज बैठ कर नियरे सुलगावै

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प्रिय के बिन राति ये कल्प सी लागे
उर उरोज में तेरो प्रेम शूल कुटिल उगावे
यह तन सुलग सुलग कर कागा सा लागे
कागा तो अच्छो कोयल के हिय लागे

पूस माघ की ये रातें जी को ठन्डावे
गति मेरे जिय की ऐसी ज्यों सापिन डरावे
धक -धक करता ज्यों इंजन सा जावे
प्रिय बिन बैरिन भये मेरो हिय गात

डॉ मधु त्रिवेदी

 
 
  • 08
  • जन

गायब हो गयी
वो बच्चों की तोतली
बन्द हुई दादा दादी की कहानियाँ
अब नही सुनते चंदा मामा
परियों की कहानियाँ
अब नही भाती शेर
खरगोश की कहानियाँ
अब केवल मस्त मोबाइल में

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दादा दादी का लाड़प्यार
दूर कोंसों हो गया
जिन्दगी को जीने की राह में
अपने ही अपनों से दूर हो गये
नही फुर्सत माताओं को
बच्चों को समझने का
 
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मोबाइल के गेम्स
टी.वी ही है मनोरंजन के साधन
छोड़ पड़ोस और मित्रों को
फेसबुक के ही मित्र भाते है
परहेज करने लगे है अपनों से
मोबाइल में लीन हो जाते है
पर लगती ये बातें बड़ो को
स्टेटस सयम्बल की प्रतीक

गुटके ,कन्चे ,साँप-सीड़ी ,लूडों
जैसे खेल टेक्नोलॉजी की भेंट चढ़ गये
बच्चों को अच्छी नही लगती
आदर्श ,उसूलों की बातें
शायद बच्चे भी मशीन हो गये
तभी भातें उनकों मशीनी उपकरण
एन्ड्राइड और स्मार्ट फोन है
बेहद पसन्द गेम

डॉ मधु त्रिवेदी
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