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  • 03
  • अप्रै

"आज आखिरी नवरात्रा माँ का... खूब धूमधाम से करने का मन था ममता का , नौ कन्याओं को न्यौता देने निकली ममता को सिर्फ चार कन्याएं ही मिल पाई मुश्किल से... अब क्या करे , कैसे उद्यापन करे गी... कुछ वर्ष पहले तक कभी ऐसी समस्या नही होती थी , पर अब कुछ वर्षों से ....

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"याद आने लगी अपनी बहू , जिसको उसने दो साल पहले घर से निकाल दिया था... कसूर था सिर्फ बेटियों को जन्म देना , दो बार उसने बहू का गर्भपात सिर्फ कन्या भ्रूण की वजह से कराया था... जब कहा था ममता ने अपनी बहू को 'कलमुँही निकल जा यहां से अगर तो पोते को जन्म नही दे सकती तो तेरे लिए मेरे घर में भी कोई जगह नही' और तीन बेटियों के साथ बहू रोती बिलखती मायके चली गई"...
"अचानक ममता उठी और घर से निकल पड़ी अपनी बहू को वापिस घर लाने के लिए... सास को सामने देखकर हैरान रह गई सुमन... 'मांजी आप अचानक यहाँ, "हाँ बहू, अपने घर चलो..."मेरे घर की लक्ष्मी हो तुम, कहा है मेरी पोतियां , कहते हुए ममता रो पड़ी और बहू को गले से लगा लिया... आज उसे कन्याओं का महत्व समझ आ गया था , देवी माँ तो तभी खुश होंगी ना जब गृहलक्ष्मी खुश रहेगी"...
"मिटटी की सोंधी खुशबु सी होती है बेटियां ,आँगन की तुलसी पूजा सी होती है बेटियां ,मरती रहेंगी बेटियां तो बहू कहाँ से लाओगे ,बेटों को पैदा करने को जननी कहाँ से पाओगे"...???

रश्मि डी जैन
नई दिल्ली

  • 03
  • अप्रै

मन करता है
ज़िन्दगी की स्याही को
पानी की कलम से मिटा दूं
सारी यादें भूल जाऊं
नई कलम से
नयी इबारत लिखूँ
जबान सोच कर खोलूँ
जितना आवश्यक उतना ही बोलूं
सोच समझ कर कदम बढाऊँ
नित नए रिश्ते बनाऊं
हर रिश्ता हृदय से निभाऊं
न किसी से दूर रहूँ
न किसी के पास जाऊं
सच्चाई का दामन थाम लूँ
न झूठ बोलूं न झूठ सुनूं
दायरे में सिमट कर भी
सब का चहेता बन जाऊं

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
वरिष्ठ चिकित्सक,अजमेर

  • 03
  • अप्रै

बार बार
भिन्न चेहरा दिखाऊं
कभी सावन
कभी भादो हो जाऊं
तूफ़ान भी नहीं हूँ
क्रोध में रिश्तों को
तहस नहस कर दूँ
आंधी भी नहीं हूँ
नाराजगी की
तेज हवाओं से
किसी के मन में
दहशत भर दूँ
शीतल हवा का झोंका हूँ
जिसे स्पर्श कर लूँ
मन को सुन्दर
अहसासों से भर दूँ
दुबारा लौट कर आऊं
ऐसी इच्छा मन में भर दूँ

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
वरिष्ठ चिकित्सक,अजमेर

  • 03
  • अप्रै

छोटी बात में बड़ी बात
बड़े मकान की
बड़ी खिड़की से झांका
हरे भरे लहलहाते
वृक्षों से भरा द्रश्य दिखा
नदी में बहता निर्मल जल
पक्षियों का कलरव
प्रेम में डूबा फाख्ता का
जोड़ा दिखाई दिया
मकान के छोटे से कमरे की
छोटी सी खिड़की से देखा
वही द्रश्य दिखाई दिया
छत पर जाकर देखा
वहाँ से भी वही दिखा
जो पहले देख चुका था
अब तक समझ चुका था
मन की आँखें खुली हो
दृष्टि विहंगम हो
सोच सार्थक
सकारात्मक हो
छोटी बात में भी
बड़ी बात दिख सकती है

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
वरिष्ठ चिकित्सक,अजमेर