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  • 10
  • मार्च

वो एक आफिसर था.... अक्सर देर रात तक ऑनलाइन रहता था,
पत्नी के पूछने पर कहता था ऑफिस के मैसेज, ईमेल आते हैं, जबाब देना होता है...... पत्नी चुपचाप सच मान कर सो जाती।

 

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कई दिनों की चैट के बाद आज उसकी माशूका भी यही सवाल करती है......... ऑनलाइन होकर भी मैसेज सीन नही करते.... जबाब वहीँ जो पत्नी को दिया।

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खचाखच भरी लोकल ट्रेन, चलने ही बाली थी कि अचानक कुछ लेडीज छ-सात बैग के साथ वोगी मे चढी,,
इधर उधर नजर दौड़ाई जगह के लिए, अचानक से तीन सीट वाली सीट पर खिडकी की तरफ बढी और जबरदस्ती बैठ गई, लडका शर्म से वहीँ सिकुड़ गया, धीरे-धीरे उसने अपनी बेटी को भी बैठा लिया, मेरा बेटा वहां से उठकर मेरी गोद में आकर बैठ गया,
गोद में लिए-लिए मेरे पैर दर्द करने लगे,,, तो मेने अपने पैर सामने की सीट पर फैला दिए
अचानक से वो लेडी मुझ पर चिल्लाई.......
"ये पैर नीचे रख...मेरी बेटी को छू रहे है "
लेकिन क्या मजाल कि कोई कुछ बोले... शरीफ लोग जो ठहरे,,,

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एक तो जबरदस्ती घुसकर सीट पर बैठी, फिर अपनी बेटी को भी बिठाया, सबसे बडी बात वैसे तो कोई किसी को सीट नही देता पर इनके ऐसे व्यवहार के लिए सभी चुप....
वो मुझ पर हावी हो रही थी.......
"ये हैलो.... जरा तमीज मे रहिये, तकलीफ है तो कही और जाइये, समझी... तूम्हारी वजह से दो घंटे से बेटे को गोद में लिए हूँ .... बात करती है... ये पैर यही रहेंगे, जो करना है कर ले "
मेरे ऐसे शब्दों की आशा न थी उसे.... ये सुन वो चुप हो गई फिर वह जब तक न बोली जब तक मेरा डेस्टिनेशन न आ गया
गोधरा कांड भी इसी चुप्पी का नतीजा रहा होगा,,,,
समझदार को इशारा काफी

रजनी चतुर्वेदी

  • 10
  • मार्च

रातें हो चांदनी
दिन उजाले से भरा हो
ज़िंदगी में इक ऐसा
जहां मयस्सर हो
हर दिन
रोशनी से नाहता हो
ना चेहरे पर मायूसी
ना आँखें बुझी बुझी हो
दिल खुशी से नाच रहा हो
मन में सुकून के फूल खिले हों
जुबां से महकती बातें निकले
आँखों में चमक
ख़्वाबों में ज़न्नत के नज़ारे हो
ख्याल हंसी सपनो से भरे हो
कब सुबह शाम हुई
मालूम ही ना चले
बेफिक्री की इंतहा हो
ज़िंदगी मोहब्बत में
गुजरती रहे
खुदा की इतनी सी
मेहरबानी हो
रातें हो चांदनी
दिन उजाले से भरा हो
ज़िंदगी में इक ऐसा
जहां मयस्सर हो

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
वरिष्ठ चिकित्सक, अजमेर

  • 10
  • मार्च

जो चला गया वो चला गया
चाहे मन रोये
चाहे ह्रदय रोये
चाहे आँखों से आसूं बहे
मुंह से निकली बात
कमान से निकला तीर
बचपन हो या जवानी
जो चला गया
वो चला गया
जिसने समझ लिया
मन में बिठा लिया
उसने आधा दुःख
जीत लिया
जो ना समझा
उसने दोगुना
दुःख बढ़ा लिया

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
वरिष्ठ चिकित्सक, अजमेर

  • 10
  • मार्च

दुखों को चौराहे पर मत टांगो
स्वयं को
निर्बल मत दर्शाओ
हर आता जाता व्यक्ति
अपने सोच से
गुण दोष निकालेगा
कारण पूछेगा
कोई सहानूभूति दिखाएगा
कोई छींटाकशी करेगा
तुम्हें ही कारण बताएगा
कम होने के स्थान पर
दुःख बढ़ जायेंगे
दुखों को धैर्य की
कोठरी में डाल दो
इश्वर से प्रार्थना करो
स्वयं पर विश्वास रखो
समय के साथ थक कर
दुःख साथ छोड़ देंगे
सुख का प्रवेश होने देंगे

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
वरिष्ठ चिकित्सक, अजमेर