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  • 29
  • सित

बागपत 29 सितम्बर। रावण शब्द सुनते ही मन में खलनायक की छवि उभरती है। दशहरे के दिन बुराई का प्रतीक बताकर दशानन का पुतला भी फूंका जाता है, लेकिन बागपत जिले के रावण गांव के ग्रामीण लंकेश के प्रति अपार श्रद्धा रखते हैं। सदियों से यहां रावण की पूजा की जाती है। गांव में न तो रामलीला होती और न ही रावण का पुतला फूंका जाता। रावण का इस गांव से गहरा नाता रहा है।

दिल्ली-यमुनोत्री हाईवे पर पाठशाला चौराहे से 11 किमी दूर रावण उर्फ बड़ा गांव पुरातत्व और धार्मिक दृष्टिकोण से खासा महत्व रखता है। किवदंति, अवशेष, सैकड़ों साल पुरानी मूर्तियां और मंदिर इस गांव को सुर्खियों में बनाए रखते हैं। बताते हैं कि लंकाधिपति रावण यहां आया था। मंशादेवी मंदिर के पुजारी रमाशंकर तिवारी के अनुसार, रावण हिमालय से मंशा देवी की मूर्ति लेकर गुजर रहा था। रावण उर्फ बड़ा गांव के पास उसे लघुशंका लगी। मूर्ति रखकर वह लघुशंका चला गया।

मूर्ति स्थापना को लेकर विशेष शर्त थी कि पहली बार मूर्ति जहां रखी जाएगी वहीं स्थापित हो जाएगी। इस कारण मां की मूर्ति इस गांव में स्थापित हो गई। रावण ने मूर्ति स्थापित होने के बाद यहां एक कुंड खोदा और उसमें स्नान के बाद तप किया। इस कुंड का नाम रावण कुंड है। कहा जाता है कि रावण के समय का मां मंशा देवी का मंदिर अभी भी गांव में स्थापित है। इसी किवदंति के चलते इस गांव का नाम रावण पड़ गया। राजस्व अभिलेखों में भी इस गांव का नाम रावण उर्फ बड़ा गांव दर्ज है।

गांव के निवासी व शोधकर्ता कुलदीप त्यागी बताते हैं कि किवदंतियों और खुदाई में मिले प्रमाणों के अनुसार ऐसी पुष्टि होती है कि रावण ने यहां पर मंशा देवी मंदिर की स्थापना की। इसी आधार पर गांव को रावण नाम का दर्जा प्राप्त है। ग्रामीण रावण को गांव का संस्थापक मानकर उन्हें पूजते हैं।

रावण गांव ऐतिहासिक धरोहरों के नजरिए से भी काफी महत्वपूर्ण है। यहां सिद्ध पीठ मंदिर में भगवान विष्णु की दशावतार मूर्ति है। पुरातत्वविद इस मूर्ति को सातवीं शताब्दी की बताते हैं। मंदिर में प्राचीन स्तंभ और अन्य मूर्तियां अजंता एलोरा जैसी प्रतीत होती हैं। गांव में कई जैन मंदिर स्थापित हैं। दुनियाभर से जैन समाज के लोग यहां स्थित त्रिलोकतीर्थ मंदिर के दर्शन के लिए आते हैं।

विकट विद्वान रावण ने कभी भी महिलाओं से अमर्यादित आचरण नहीं किया। मां सीता से भी वह सदैव मर्यादा में रहे। सभी ग्रामीण रावण की अच्छाइयों को ग्रहण करने और उनका अनुसरण करने की कोशिश करते हैं। गांव में कभी रामलीला का आयोजन नहीं होता। न ही उनका पुतला फूंका जाता है।
मथुरा: शनिवार को विजयादशमी पर देशभर में रावण के पुतले का दहन किया जाएगा, लेकिन शुक्रवार को भगवान श्रीकृष्ण की नगरी में लंकेश्वर की महाआरती कर पूजा-अर्चना की जाएगी। यहां के रावण भक्त हर वर्ष होने वाले पुतला दहन का कई वर्ष से विरोध कर रहे हैं। रावण की पूजा कर भी वह यही संदेश देना चाहते हैं। लंकेश भक्त मंडल रावण का पूजन करने की तैयारी कर रहा है।

यमुना पर होनेे वाली पूजा में रावण के जयघोष गूंजेंगे। शुक्रवार दोपहर दो बजे यहां रावण भक्त एकत्रित होंगे। मंडल के संस्थापक ओमवीर सारस्वत ने बताया कि इस दौरान महाआरती होगी और विविध प्रकार के भोग लंकापति को अर्पित किए जाएंगे। लंकेश महोत्सव में सारस्वत अर्थात रावण के वंश के लोगों के अलावा अन्य वर्ग के लोग भी शामिल होते हैं।

 

  • 28
  • सित

वाशिंगटन । सोमवार को पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का एक नया चेहरा देखने को मिला। अपनी बड़ी बेटी मालिया ओबामा को उसके कॉलेज छोड़ कर वे काफी भावुक नजर आ रहे थे। विलमिंगटन डेलामेयर में एक क्लब को संबोधित करने के दौरान उन्होंने अपना अनुभव साझा किया।

यहां उन्होंने अपने एक छोटे से भाषण में कहा, “मैं यहां सिर्फ अपने परिवार को समर्थन देने के लिए आया हूं क्योंकि मैं उनकी बहुत चिंता करता हूं। उन्होंने कहा, “हम में से वो जिनकी बेटियां हैं वे इस अनुभव को अच्छी तरह समझ सकते हैं। उन्होंने कहा, वे अपनी सबसे बड़ी बेटी मालिया को कॉलेज छोड़ कर आए हैं, यह अनुभव उनके लिए किसी शल्य चिकित्सा की तरह था। उन्होंने अपनी पुरानी बातें बताते हुए कहा, आठ साल पहले जब उनके परिवार को शिकागो से व्हाइट हाउस ले जा गया था तब उनकी 10 वर्षीय बेटी माल्या काफी दुखी हुई थी उसने उन्हें अपने पुराने स्कूल के तस्वीरों की एक स्क्रैपबुक दी थी।

तब उसकी छोटी बहन साशा 7 साल की थी। वह नीले और काले रंग की पोशाक पहन कर आई थी जो काफी आकर्षक लग रही थी। वे पहले अश्वेत बच्चे थे, ओबामा की ये बच्चियां निजी माहौल में पले-बढ़े थे। वे अन्य बच्चों से बिल्कुल अलग दिख रहे थे। 2016 में राष्ट्रपति कार्यकाल खत्म होने के बाद ओबामा परिवार एक बार फिर से घर खाली करने जा रहे थे। और फिर पिछले महीने ही ओबामा को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के पास एक रेस्तरां में देखा गया। जहां मालिया अपना कॉलेज शुरु करने वाली थी।

इवेंट में ओबामा के द्वारा दिए गए छोटे से भाषण को काफी सराहा गया, एक लोकल रेडियो चैनल ने भी उनके भाषण के कुछ अंश को प्रसारित किया। ओबामा ने मालिया के बारे में कहा, “मुझे गर्व था कि मुझे उसे कॉलेज छोड़ते हुए उसके सामने रोना नहीं आया। लेकिन वापसी में लौटते समय स्थिति कुछ और थी।” उन्होंने कहा, “ये वो खुशियां हैं जो कि हमारे बच्चे, हमारे पोते बाद में भी याद करेंगे और इन सब के बारे में बात करेंगे। “एक व्यक्ति जो एक समय में दुनिया का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति था लेकिन अंत में वह एक साधारण इंसान ही रह जाता है, अंततः यह क्या मायने रखता है।”

  • 28
  • सित

बेगूसराय । ईश्वर की पूजा धर्म और संप्रदाय में बंधी नहीं होती। जहां एक ओर जाति और धर्म को लेकर विद्वेष की भावना से प्रभावित होकर हम इंसानियत को भूल रहे हैं, वहीं बिहार के बेगूसराय में दुर्गा पूजा के दौरान उठकर सांप्रदायिक भावना और आपसी सहयोग का एेसा अनूठा मिसाल देखने को मिल रहा है जो देश और दुनिया के लिए नजीर है।

शहर के कर्पूरी स्थान में स्थित 97 साल पुराने करोड़ीमल गजानंद माता दुर्गा मंदिर में सांप्रदायिक सौहार्द्र की अद्भुत मिसाल देखने को मिल रही है। मंदिर की व्यवस्था हिन्दुओं से ज्यादा मुस्लिमों के हवाले है। दुर्गा पूजा समिति के अध्यक्ष अशोक कुमार गोयनका ने बताया कि मंदिर कमेटी के कुल 24 सदस्यों में 17 मुस्लिम सदस्य नवरात्र से पूर्व पूजा-अर्चना और मेला के प्रबंध में लगे हैं।

शहर के सबसे प्रसिद्व मंदिरों में गिने जाने वाले दुर्गा मंदिर में रोजाना हजारों भक्त पूजा-अर्चना करने आते हैं। मंदिर से सिर्फ पचास मीटर की दूरी पर पीर की मजार है जिस पर सभी अपना सिर झुकाए बगैर आगे नहीं बढ़ते। दुर्गा पूजा हो या अन्य कोई त्योहार बगल के करोड़ीमल गजानंद माता दुर्गा मंदिर में मुस्लिम समुदाय के लोग पूरी अकीदत के साथ पूजा-अर्चना में हिन्दू भाइयों का साथ देते हैं।

मंदिर समिति के कार्यकर्ता मो. कैसर आलम का मानना है कि पर्व कोई भी हो, हमलोग एक साथ मिलकर मनाते हैं। जिस तरह दुर्गा पूजा में हमलोग पूरी तैयारी मिलकर कर रहे हैं। उसी तरह मुहर्रम की तैयारी में हिन्दू हमारे साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे हैं। वे बताते हैं कि 1921 में स्थापित इस दुर्गा मंदिर के प्रति लोगों की अपार श्रद्धा है।

मंदिर की खासियत यह है कि व्यवस्था में सभी धर्मों के लोगों का सहयोग होता है। सुबह होते ही सफाई की पूरी जवाबदेही मुसलमान तबके के लोग उठाते हैं। इस इलाके में जाति-धर्म की दीवार नहीं है। हर धर्म के लोग एक दूसरे के पर्व को मिलजुल कर मनाते हैं। मंदिर कमेटी के पदाधिकारी मुन्ना गोयनका के मुताबिक यहां इतनी भाईचारगी है कि हम हमेशा से एकता के साथ पर्व मानते आ रहे हैं।

धर्म सिर्फ इबादत के लिए है नफरत फैलाने के लिए नहीं। यह मानना है मंदिर कमेटी के कार्यकर्ता मो. कैसर, मो. अनवर, मो. अकबर खान का। कहते हैं कि दुर्गा पूजा पर मंदिर परिसर में लगने वाले मेला की पूरी व्यवस्था हम लोग मिलकर करते हैं।

मुहर्रम और दुर्गा पूजा में कोई फर्क नहीं समझने वाले यहां के लोग एक दूसरे का प्रसाद खाने और बांटने का काम भी पूरी ईमानदारी से करते हैं। पिछले 15 सालों से वे सभी मंदिर के कार्यकर्ता हैं। 20 वर्षों से इस मंदिर में कार्यकर्ता मो. असलम का कहना है कि वे यहां प्रसाद बांटते हैं।

  • 24
  • सित

नई दिल्ली। औषधीय गुणों से भरपूर नीम न केवल मानव जीवन के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि यह पशुओं, कृषि, पर्यावरण और उद्योगों की आवश्यकताओं को भी पूरा करता है। इसी के मद्देनजर इंडियन फारमर्स फर्टिलाइजर कोआपरेटिव (इफको) ने व्यापक पैमाने पर इसके पेड़ लगाने का अभियान शुरु किया है ।

नीम की पत्ती और बीज एन्टीसेप्टिक,एन्टीवायरल,एन्टीपायरेटिक,एन्टी अल्सर और एन्टी फंगल होते हैं जो सीधे तौर पर मानव स्वास्थ्य से जुड़ा है। इसे ध्यान में रखते हुए सहकारिता क्षेत्र की दिग्गज कम्पनी इफको ने न केवल देश भर में नीम के ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने बल्कि इस पर शोध कराने का फैसला किया है।

इफको के प्रबंध निदेशक उदय शंकर अवस्थी ने बताया कि देश के विभिन्न हिस्सों में पिछले वर्ष नीम के 13 लाख पौधे लगवाए गए थे और इस वर्ष इसके 26 लाख पौधे लगाए जा रहे हैं। उन्होंने नीम की एक ऐसी किस्म विकसित की गयी है जिसमें निमौली पांच छह वर्ष में लगनी शुरु हो जाती है जबकि इससे पहले नीम के पेड़ में दस साल में फल लगने शुरु होते थे। 

उन्होंने कहा कि दुनिया में बदलाव आ रहा है और लोग रसायन को छोड़कर जैविक उत्पादों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। तापमान में वृद्धि हो रही है और पर्यावरण में बदलाव आ रहा है जिसके कारण वह नीम पर शोध को बढ़ावा दे रहे हैं । नीम पर शोध के लिए कम्पनी ने देहरादून स्थित वन शोध संस्थान के साथ करार भी किया है ।-एजेंसी