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  • 12
  • फरव

रोज़ एक ही सवाल पूछता है
उसका नारी मन
डरती भी है रोज़ाना
वही रात फ़िर आएगी
घूरती निगाहें तुम्हारी
उसकी सम्पूर्ण देह को भेदती हुई...
अनादिकाल से तुम्हारा और उसका
एक ही रिश्ता रहा
मर्द और औरत का
सिर्फ जिस्म से जिस्म का...

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पुरुष के लिए नारी
सिर्फ भोग्या रही..सिर्फ शारीरिक संतुष्टि का साधन मात्र...
अनेक रिश्तों में बंधी होने के बावजूद
हर पल हर क्षण दिया
अपनत्व का अहसास...
लेकिन तुमने तो नारी को
सिर्फ एक शरीर ही समझा है न
आज तक..है ना
सदैव तन को जाना, मन को नही
नारी के रूप में
अनेको रिश्ते निभाए है उसने..
'कभी माँ बन कर देखभाल की
तो कभी बहन बन कर किया दुलार
तो दिया कभी प्रेयसी का प्यार
बेटी बन कर सेवा की
तो बन कर दोस्त दिया तुम्हारा साथ' हर मौके पर दुःख और सुख में..
आखिर तो
बनकर पत्नी कर दिया समर्पण
सम्पूर्ण समर्पण...

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लेकिन तुम आगे न बढ़ सके
कभी देह से उसकी...
न जान सके कभी मन को
जाना तो सिर्फ तन को ...
हां सिर्फ तन को...
एक दासी की भांति
उसमे सिर्फ समर्पण ही तो खोजते रहे जीवन पर्यन्त...
मन से तुम्हारी न होकर भी
तुम्हारी बनी रही..तो सिर्फ तन से...
आखिर वो एक स्त्री ही तो है
हां 'सिर्फ एक स्त्री'...

रश्मि डी जैन,
महासचिव, आगमन साहित्यक समूह
नई दिल्ली

  • 10
  • फरव

विनय की छुट्टीयाँ खत्म हो चुकी थी नवम्बर महीने की जमा देने वाली कड़ाके की ठण्ड पड रही थी और विनय ने बडी मुश्किलों से आरक्षण तत्काल में कराया था । छुट्टीयाँ खत्म होने से पहले ही उसे सर्विस से फोन आ गया और वापस ड्यूटी पर पच्चीस तारीख को हर हाल में पहुचना था। वायु सेना की सर्विस में जहाँ सुविधाऐं होती है वहीं अनुशासन भी कडा होता है । विनय की पत्नी संध्या मेरी सहेली थी, बडी उदासी में फोन करके उसने बताया था, हमें चौबिस तारीख की रात को ही निकलना होगा, अगली बार जरूर मिलूगी तुमसे।
उन्होनें बल्लभगढ से दिल्ली तक का सफर बस से तय किया ।
विनय के लाख मना करने पर भी संध्या ने इस बार भी काफी समान भर लिया था चार बैग कपडो से ठूसे हुऐ साथ ही एक टी वी भी..
विनय ने खूब समझाया था वहाँ ले लेगें संध्या, इसे कौन ढोता फिरेगा
संध्या- मै क्या कमजोर हूँ मै ले चलूगी, आप चिंता मत करो, औरतों को कमजोर समझना बंद कर दो आप ।
विनय: चलो देखते है ।
माँ बाप की दी हुई चीजों से बेटियों को बहुत लगाव होता है, संध्या की ये जिद भी उसी का परिणाम थी।
दिल्ली पहुँच कर संध्या को विनय ने महिला प्रतीक्षालय में रूकने को कहा
विनय आरक्षण चार्ट देखकर बोला, मै अभी आता हूँ, कुछ खाना है तो बताओ।
संध्या अपना पर्स टटोलते हुए बोली, आप जाओ मै खुद ले लूगी, जो लेना होगा
फिर रूकी विनय की ओर देखते हुए, सामान का ध्यान कौन रखेगा
ठीक है कहीं बन रही है तो आप चाय दे जाओ
विनय संध्या को चाय देकर खुद भी चाय की चुस्कियाँ लगाते आरक्षण चार्ट को तलाशते हुए तेजी से प्रतीक्षालय से बाहर आया।
इधर संध्या चाय पीते हुए एक पल घर की याद में घिर गयी वापस उसी वीराने के बीच जा रही हूँ अक्सर संध्या बताती थी कि क्वाटर जब भी घर सा लगने लगता है तो पोस्टींग आ जाती है पुरानी सखी सहेली छूटती है बहुत दुख होता है।
पटना की पोस्टिंग को अभी 4 महीने ही हुए थे संध्या बीटा ऐयर फोर्स स्टेशन के नये घर में अभी मन भी नहीं लगा पाई थी जो एक जंगल सा लगता था जहाँ शाम होते ही भेडीयों के रोने की आवाजे सुनाई पडती थी, क्वाटर की टुटी खिडकियों से कई बार साँप अन्दर आ जाते थे।
विनय की रात की ड्यूटी और संध्या का दिन भर इंतजार, इन सब ख्यालों में डूबी ही थी, इतने में उसे विनय आता दिखा वह संभलकर ठीक होकर बैठी और चिंतातुर स्वर में बोली, सीट की पुष्टि हो गयी ना?
विनय: हो तो गयी बी.वन थर्टीफोर, थर्टी फाईव है।

चलो लग गयी है ट्रेन
संध्या : कूली कर लेते
विनय : मुस्कुराते हुए, दो बैग दोनो कांधो पर, दो हाथों में पकडने लगा मै कूली ही हूँ ।
संध्या : टी वी.मै ले लूगी
विनय : अरे कहीं नहीं जा रहा तुम्हारा टी.वी. तुम ये बैग ले लो बस

 

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एक कांधे पर संध्या के बैग और दूसरे हाथ से टी वी पर लिपटे एक पुराने कम्बल को पकड विनय का साथ देने लगी।
विनय का मुंँह लाल हो चला था तुम रहने दो, मै ले रहा हूँ ना आगे चलो तुम
संध्या: मै गाँव की छोरी हूँ आखिर कमजोर नहीं हूँ आप बस एक ओर से पकडे रहो ।
विनय मुस्कुरा दिया, पटना एक्सप्रेस के दरवाजे पर काफी घक्का मुक्की सहते सीट तक पहुँचे।
सुबह चार बजे आरा से बीटा होती हुई पटना चार बजकर चालीस मिनट तक पहुँचती है पटना एक्सप्रेस, लेट हो जाऐ तो अलग बात।
धुंध की वजह से उन.दिनों काफी देरी से भी पहुँच रही थी ट्रेनें।
पटना से बीटा वायु सेना आटो बुक करके पहुँचना होता था
कई बार ट्रैन बीटा स्टेशन पर एक दो मिनट रूक जाती तो बीटा उतर जाते थे ये लोग।
संध्या : अलार्म लगा दिया है ना? कहीं ....
विनय : मेरे तो दिमाग में ही फिट हैं अलार्म मैडम, कह कर मुस्कुरा दिया । फिर भी लाओ तुम्हारे फोन में लगा देता हूँ चार बजे से पहले तो बीटा स्टेशन पहुँचनी नहीं है।
नीचे की सीट पर संध्या, बीच वाली बर्थ में विनय सो गया। करीब तीन बजकर चालीस मिनट हुऐ थे संध्या वाश रूम जाने को उठती है संध्या की चूडीयों और पायल की आवाज से विनय भी जाग उठा
विनय : अरे चलो मै चलू एक बजा है
संध्या अपमान.सा महसूस कर गयी
आप भी ना बस डरपोक ही समझते.रहोगे मुझे, कहते हुए शॉल ओढा और चल दी
विनय : जल्दी आना आरा स्टेशन आया है अभी
बीटा रूकने की सम्भावना हो चली थी विनय ने सारे बैग निकाले सीट के नीचे से और गेट तक टीवी समेत सब सामान लगा दिया संध्या भी आ गयी थी इधर विनय मन में कह रहा था बीटा रूक जाऐ काश....
उधर संध्या मन ही मन में --यहाँ रूकी तो इतने अंधेरे में कैसे जाऐगें, बीचो बीच रूकेगी प्लेट फोर्म पर नहीं
बीटा स्टेशन पटना राजधानी रूकती है दोनों बिल्कुल घुप्प अन्धेरें के बीच उतरे जैसे तैसे संध्या ने फोन की टार्च जलाई और भाग दौड कर रेलवे लाईन पार की
आगे बंद दुकानें घना अंधेरा, दूर एक दुकान के नीचे एक बल्व की हल्की सी रौशनी थी बस
वहीं फोन की बैटरी भी स्लो होती जा रही थी।
संध्या ने अपनी आवाज करती पायल पर्स में रख ली।
विनय ने चिंतित स्वर में बल्ब की रौशनी के साथ बंद दुकान के शटर की ओर सब सामान लगा संध्या से वहीं रूकने को कहा
मै आटो देखकर आता हूँ तुम रूको
संध्या भय छिपाते हुऐ हाँ ठीक है पर जल्दी आना
विनय को जाता देख संध्या आस पास की अंधेरी गलियों की ओर देख सहम सी गयी वहीं से दो आदमी उसे ताकते हुऐ गुजरे एक तो बिहारी भाषा में अभद्र गीत गुनगुनाता रहा था ।

 

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उनके जाते ही संध्या ने ठण्डी साँस ली और टीवी.पर.लिपटा बदबूदार पुराना कम्बल ओढ लिया ,नाक, माथा तक ढक कर अब उसकी नजर अपने पावों में सैडलों पर पडी संध्या तुरंत बैठ गयी अब वो एक बूढे आदमी की तरह दिखने लगी एक आदमी उसकी ओर आता दिखा आगे से निकल गया बिना उसकी ओर ध्यान दिये

आज संध्या खुद के औरत होने पर स्वयं को कोस रही थी
एक आटो संध्या को अपनी ओर आता दिखा ओर जैसे जैसे नजदीक आया, ऑटो की गति कम हो गयी गयी
संध्या ने ऑटो को देखा तो उसमें भी विनय नजर नहीं आया।
आटो चालक संध्या को ताकते हुए बोला चलोगे क्या बाबा?
संध्या ने बिना आवाज निकाले मुंह से ना में गर्दन हिला दी।
आटो आगे निकल गया अचानक संध्या को कांधे पर एक हाथ रखा किसी ने,
चौंक कर उठी ओर चीख निकल गयी
देखा तो विनय था।
रो पडी विनय को देखते ही
संध्या : इतनी देर लगा दी आपने
विनय : क्या करता मै भी, आगे तक जाना पड़ गया था आटो आ रहा है पीछे और तुमने ये बदबूदार कम्बल कैसे ओढा ?
विनय व्यंगात्मक हंसी लिए बोल उठा, संध्या कुछ ना बोल सकी शिकायत भरी नजरों से विनय को एकटक देख रही थी
विनय : डर गयी थी ना?
क्या हुआ मेरी झांसी की रानी को इतने में बुक किया हुआ ओटो भी आ गया संध्या बीस मिनट के जंगल जैसे रास्ते भर चुप रही, शायद स्त्री- पुरूष के बीच का फर्क, जो परमात्मा ने ही कर दिया उसके अहसास ने, उसे सोच में डाल दिया था उस दिन।

साधना शर्मा "गीत" 
गुरूग्राम, दौलताबाद

  • 10
  • फरव

मैं ब्रम्हा हूँ जो कहा वही सत्य बाकी सब मिथ्या
अचरज है ये ब्रम्ह ज्ञान कुछ लोगो को विरासत में मिलता है
कलयुग में ये ज्ञान काले चश्मे से बहता है
कुछ यहाँ से सुनो कुछ वहाँ से सुनो फिर मुनादी करो

 

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मनुष्य का अपना सामर्थ्य और ज्ञान यहाँ आवश्यक नहीं
सिर्फ चश्मा काला हो तो आकाशवाणी में परम आनंद हो
आजकल आकाशवाणी फेसबुक पर ज्यादा गूँजती है
सुरो को ललकारने के लिए असुर शक्ति का प्रयोग
दूर से फेंके गए इस प्रक्षेपात्र का असर विज्ञापन के साथ
अंदाज़ नया है पर काला चश्मा वही
 
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काले चश्मे से ना सिर्फ उजाला भी काला नज़र आता है
बल्कि दिमाग का जाला भी नज़र आता है
इंसान खुद को ईश्वर तुल्य समझता है अपनों का अनादर करता है
सच तो ये है पहाड़ी पर बैठा वो भ्रम में जीता है
ज्ञान की गंगा बहाता है और खुद पानी से भी डरता है (अहम् ब्रम्हास्मि )

प्रस्तुतकर्ता- मंजुला बी.शाह
जयपुर

 

  • 10
  • फरव

आदमी के आगे आदमी
आदमी के पीछे आदमी
दायें आदमी बाएं आदमी
हर जगह आदमी ही आदमी
खुद से बात करे तो भी
सुन लेता कोई आदमी
भीड़ में खो गया आदमी
खुद को आईने में देखे
तो भी दिखता नहीं आदमी
खुदगर्ज़ी का
गुलाम हो गया आदमी
अपनों को पहचानता नहीं
परायों से डरता है आदमी
नफरत का
घर बन गया आदमी
अब आदमी रह गया
बस नाम का आदमी
खुद पर भी भरोसा
करता नहीं आदमी

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
वरिष्ठ चिकित्सक
अजमेर