धर्म आस्था (18)

धर्म आस्था

पांच साल बाद एक बार फिर भोपाल से फ्लाइट आपरेशन शुरू करने की तैयारी कर रहा है स्पाइस जेट। इंडिगो और विस्तारा की उड़ानें भी शुरू होने की उम्मीद

भोपाल। भोपालवासियों के लिए शिर्डी वाले साईं बाबा के दर्शन अब और भी आसान हो जाएंगे। नए साल पर स्पाइस जेट तोहफे के रूप में लोगों को नई उड़ान की सौगात देने की तैयारी कर रहा है।

कम किराए वाली एयरलाइंस के रूप में प्रसिद्ध स्पाइस जेट ने पांच साल बाद एक बार फिर भोपाल से फ्लाइट आपरेशन शुरू करने का फैसला किया है। कंपनी भोपाल से टूट चुका साउथ कनेक्शन जोड़ने के साथ ही शिर्डी तक भी डायरेक्ट उड़ान शुरू करेगी। कंपनी ने जनवरी 2019 से एक साथ चार उड़ानें शुरू करने का प्रस्ताव दिया है।

एयरपोर्ट अथारिटी काफी समय से भोपाल से हवाई यातायात बढ़ाने का प्रयास कर रही थी। हाल ही में शुरू हुए सपोर्ट भोपाल फॉर एयर कनेक्टिविटी अभियान टीम ने भी इसके लिए सोशल प्लेटफार्म मुहिम शुरू की थी। इसका असर दिखाई देने लगा है। बुधवार को स्पाइस जेट के रीजनल मैनेजर (एयरपोर्ट सर्विस) बिजेंद्रसिंह एवं मैनेजर इंजीनियरिंग अमित कुमार ने एयरपोर्ट पर उपलब्ध सुविधाओं का अवलोकन किया। एयरपोर्ट अथारिटी ने बैठक में कंपनी को यहां मौजूद सेवाओं एवं सुविधाओं का प्रेजेंटेशन दिया। बैठक में एयरपोर्ट डायरेक्टर अनिल विक्रम एवं उपमहाप्रबंधक राकेश बाहेरी सहित अनेक अधिकारी मौजूद थे। निरीक्षण के साथ ही कंपनी ने अपना बुकिंग कार्यालय खोलने की सहमति भी दे दी।
*चार उड़ानों के साथ होगी शुरूआत*
कंपनी ने पहले चरण में भोपाल से हैदराबाद, जयपुर, अहमदाबाद एवं शिर्डी के लिए उड़ान शुरू करने का फैसला किया है। श्री विक्रम के अनुसार कंपनी जनवरी 2019 से अपनी उड़ानें शुरू कर देगी। कंपनी ने बुकिंग कार्यालय के साथ ही इंजीनियरिंग मेंटेनेंस कार्यालय के लिए भी जगह दे दी है। दूसरे चरण में कंपनी यहां मेंटेनेंस सेंटर खोलेगी। यह खुलते ही कंपनी के विमान भोपाल में नाइट हाल्ट कर सकेंगे। इससे यात्रियों को सुबह के वक्त बिना विलंब के उड़ानें मिल सकेंगी। कंपनी ने भविष्य में चेन्नई एवं बंगलुरू के लिए उड़ान शुरू करने का भी भरोसा दिलाया है। स्पाइस जेट ने सन 2009 में भोपाल में उड़ानें शुरू की थीं, लेकिन 2013 में कंपनी ने सभी उड़ानें बंद कर दी थीं।
*इंडिगो ने सुरक्षा राशि जमा कराई*
हाल ही में बजट एयरलाइंस इंडिगो ने भी भोपाल से प्रमुख शहरों के लिए उड़ानें शुरू करने की सहमति दी थी। कंपनी ने एयरपोर्ट पर बुकिंग कार्यालय खोलने की तैयारी की है। बुधवार को कंपनी ने इसके लिए जरूरी औपचारिकताएं पूरी की। सुरक्षा राशि भी जमा हो गई। इससे यह साफ हो गया है कि कंपनी जल्द ही उड़ानें शुरू करेगी। टाटा समूह की विस्तारा एयरलाइंस की उड़ानें भी अगले साल शुरू हो सकती हैं।

हमने लगभग सभी एयरलाइंस को भोपाल से उड़ानें शुरू करने का आग्रह किया था। इंडिगो के बाद स्पाइस जेट ने भी हमारा आग्रह स्वीकार कर लिया है। वर्ष 2019 हमारे लिए काफी महत्वपूर्ण होगा। देश के हवाई मानचित्र पर भोपाल भी प्रमुखता से नजर आने लगेगा।

अनिल विक्रम, एयरपोर्ट डायरेक्टर

लुनिया का बड़ा ऐलान - जैन प्रेस क्लब के माध्यम से समाज की सभी खबरों का होगा निशुल्क प्रकाशन, पदाधिकारी भेज सकेंगे सत्यापित खबरे, व्हाट्स एप नंबर हुआ जारी
 
इंदौर : जैन मीडिया सोशल वेलफेयर सोसाइटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार एवं समाज सेवी विनायक अशोक लुनिया ने समाज की खबरों को मजबूती देने के उपदेश्य से गठित जैन प्रेस क्लब द्वारा समाज की खबरों का राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशन पूर्णतः निशुल्क रूप से किया जाने की बात कही है। श्री लुनिया ने बताया इस श्रेणी में समाज की समस्याएं व आयोजनों आदि शामिल होंगे अगर समाज का कोई वर्ग विशेष रूप से कवरेज करवाना चाहेगा तो वो सशुल्क कवर किया जाएगा। श्री लुनिया ने साथ इस पर विशेष बात कही है की खबरों के प्रकाशन के साथ ही समाजजनों के व्यक्तिगत रूप से परेशानी पर भी कार्य किया जायेगा। वहीँ समाजजनों के विचारों पर संवाद भी विचार कर संपादक मंडल द्वारा समझ कर मीडिया में प्रेषित किया जायेगा। श्री लुनिया ने बताया कि आज जैन प्रेस क्लब के भारत वर्ष में 50 से अधिक जिलों में पदाधिकारियों की नियुक्ति हो चुकी है वहीं निरंतर नियुक्तियां जारी है। श्री लुनिया के अनुसार समाज के हर क्षेत्र में पदाधिकारियों द्वारा भेजी गई समाचार को समसोधित कर के आगे प्रकाशित किया जाएगा जिसके लिए संगठन द्वारा समय समय पर समाज के लिए पत्रकारिता के क्षेत्र में विभिन्न वर्कशॉप आदि का आयोजन भी किया जाएगा । संगठन के राष्ट्रीय महासचिव व जैन प्रेस क्लब के राष्ट्रीय प्रभारी राष्ट्रीय अध्यक्ष अतुल जैन ने नंबर जारी किया 8319031105 श्री जैन ने नंबर जारी करते हुए बताये की इस नंबर पर सिर्फ सत्यापित खबर कोई भी संगठन के पदाधिकारी द्वारा अपने नाम एवं पदनाम के साथ भेजा जाना अनिवार्य होगा कोई समाजजन अगर खबर भेजना चाहते है तो उनको अपने क्षेत्र के जैन प्रेस क्लब पदाधिकारी से संपर्क करना होगा। श्री जैन ने समाचार भेजने के सम्बन्ध भी प्रकाश डालते हुए कहा की जैन समाज से जुड़े समाचार भी प्रकाशन हेतु आगे भेजा जायेगा अन्य खबर प्रेषित करने पर पदाधिकारी को उच्च पदाधिकारी या सम्बंधित पदाधिकारी को जवाब देना होगा।
फेसबुक का जैन धर्म पर बड़ा आघात, दिगंबर जैन संतो को बताया अश्लील, फोटो डालने पर अकाउंट ससपेंड
जैन मीडिया ने किया फेसबुक के इस फैसले का विरोध, कहा जैन समाज फिर एक बार २४ अगस्त २०१६ को दौरहेगा, जैन धर्म गुरु के चित्र को अश्लील बताने पर फेसबुक को मांगना होगा माफ़ी
 
इंदौर : जैन समाज के एक संप्रदाय दिगंबर समाज में संतों का नग्न अवस्था में रहना सदियों पुराणी प्रथा है और यह प्रथा सिर्फ जैन धर्म में ही नहीं वरन सनातन धर्म में भी नागा साधु के रूप में तपस्वी प्रसिद्ध है ऐसे में फेसबुक गत २ - ३ माह पूर्व से जैन संतों के तस्वीर डालने पर फेसबुक अकाउंट को ३ दिन से लगा कर ३० दिन (एक माह) के लिए ब्लॉक (ससपेंड) कर दे रहा है. यह मामला प्रकाश में तब आया जब २१ नवम्बर २०१८ को उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिला में दिगंबर संत श्री आचार्य विधायसागर जी महाराज जिनको जैन समाज धरती के भगवान मानता है तो वहीँ अन्य धर्म के लोग भी आचार्य श्री के दर्शन कर खुद को धन्य मानते है. ऐसे में जब ललितपुर नगर प्रवेश के चित्र जिसपर मनुष्य शरीर में मौजूद (प्रायवेट पार्ट) की जगहों पर समाज जन द्वारा किसी धर्म या मनुष्य को आघात न हो इस लिए एडिटिंग कर के पोस्ट किया गया जिसके बाद भी फेसबुक ने एक सन्देश देते हुए कहता है की आपके द्वारा पोस्ट किया गया फोटो सामग्री नग्नता या यौन सामग्री में यह शामिल होता है. जिस सन्दर्भ में 4 कारणों का हवाला देते हुए फेसबुक अकाउंट को बंद कर दिया जो की निम्न प्रकार है १- यौनांग दिखने वाली नग्नता, २- योन गतिविधि, महिला के स्तन, कामुक भाषा. जिस से यह जैन समाज में आघात हुआ है की फेसबुक जैन धर्म के धर्म गुरु को अश्लीलता के साथ तौल रहे है.
 
जैन मीडिया ने किया विरोध कहा हम करेंगे फेसबुक के खिलाफ आंदोलन
 
जैन मीडिया सोशल वेलफेयर सोसाइटी के राष्ट्रिय अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार विनायक अशोक लुनिया एवं राष्ट्रिय महासचिव अतुल जैन ने बताया की इस घटना के बाद से जैन समाज में भारी मात्रा में फेसबुक के खिलाफ रोष है एवं यह हमारे धर्म व् धर्मगुरु का अपमान है, जिसको जैन समाज किसी कीमत पर बर्दास्त नहीं करेगा और जल्द ही देश भर में फेसबुक के खिलाफ रैली एवं अन्य माध्यम से अपना विरोध दर्ज करवा कर फेसबुक को जैन धर्म गुरु के लिए उपयोग किया गया शब्दों को वापस लेते हुए जैन समाज से माफ़ी मांगने के लिए मजबूर करेगा.
 
फेसबुक पर होता है खुले आम पोर्न प्रदर्शन 
 
श्री लुनिया ने आगे बताते हुए कहा की एक तरफ फेसबुक नग्नता का हवाला दे रहा है वहीँ फेसबुक के द्वारा निर्धारित मानकों के दायरे में आने वाले पोर्न पोस्ट धडले से फेसबुक पर पोस्ट शेयर हो रहे है यहाँ तक पोर्न वाली प्रोफाइल पिक्चर एवं पिक्चर व् वीडियो ऑटो टैग हो जाते है वहीँ हजारो की तादात में फेसबुक पर अश्लील पेज व् ग्रुप बना रखा गया है उनको फेसबुक ब्लॉक नहीं कर रहा है जबकि जैन  धर्म शांति का प्रतिक होने के साथ ही धर्म अहिंसा परमोधर्म को मानता है उनके धर्म गुरु पर इस तरह का आघात समाज बिलकुल सहेगा. 
 

 

केशो राय पाटन। केशो राय पाटन धार्मिक नगरी मे कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर प्रदेश के कोने कोने से आये एक लाख लोगों ने चंबल मे पवित्र स्नान किए। शुक्रवार को सुबह तीन बजे तक ही चंबल मे सन्नान करने के लिए लोगो की भीड़ उमड़ पड़ी सुबह चार बजे मगला आरती के बाद से मंदिर में दर्शन ओर अभिषेक के भीड़ लगी रही चंबल के मार्ग से मंदिर की परिक्मा मे लोगो का हुजूम उमड़ पड़ा।

कार्तिक पूर्णिमा के अवसर धार्मिक संगठन की ओर से केशो राय जी का भंडार रा लगाया गया जिसमे हजारो लोगो ने पूड़ी सब्जी खीर हुलूवा सहित अन्य प्रसाद ग्रहण किया। वही चंबल तट पर पंद्रह दिन का कार्तिक मेला प्रारंभ हुआ। मेले में केशव रँग मंच पर रामलीला का आयोजन किया गया।

 

नीमच। साध्वी बनने के लिए मध्य प्रदेश में एक महिला ने 100 करोड़ की संपत्ति को ठुकरा दिया। इतना ही नहीं अपनी तीन साल की बच्ची का भी मोह त्याग दिया। महिला के पति ने पहले ही दीक्षा ले ली थी। दीक्षा लेने के लिए इस जोड़े को कई कानूनी अड़चनों का भी सामना करना पड़ा। 
मध्य प्रदेश के नीमच में यह घटना काफी चर्चा में है। अनामिका के पति सुमित ने पहले दीक्षा ले ली थी। उसके बाद उसने भी करीब चार हजार से अधिक लोगों को साक्षी रखते हुए साध्वी की शपथ ली। अब वह साध्वी श्रीजी के नाम से जानी जाएंगी। अनामिका की दीक्षा के दौरान 2 साल 10 माह की इभ्या को परिजनों की देखभाल में राजस्थान के कपासन में ही रखा गया। 
अनामिका के पति सुमित जो अब सुमित मुनि बच चुके हैं दीक्षा समारोह में शामिल हुए। पति पत्नी द्वारा दीक्षा लेने के लिए बेटी का परित्याग करने की बात पर दोनों का विरोध हुआ। सुमित ने 23 सितम्बर को श्री साधुमार्गी जैन आचार्य रामलाल से दीक्षा ली। उन्हें सुमित मुनि नाम दिया था, लेकिन अनामिका को महज आज्ञा पत्र मिल सका था।
कानूनी अड़चन दूर कर सोमवार सुबह सूरत में ही आचार्यश्री ने हजारों लोगों की मौजूदगी में अनामिका को दीक्षित किया। सुबह करीब 8.15 बजे केश मुंडन और सफेद वस्त्र धारण का सामयिक वाचन के साथ दीक्षा की प्रक्रिया पूर्ण हुई। अब उन्हें समाज में साध्वी अनाकार श्रीजी नाम से जाना जाएगा। अनामिका के साथ सोमवार को रायपुर के आदर्श धारीवाल ने भी दीक्षा ली। आदर्श रायपुर के एक बड़े बिल्डर के पुत्र हैं। उन्होंने महज 18 वर्ष की आयु में वैराग्य के पथ को चुना है। इस मामले में सुभाष पगारिया, महामंत्री, श्री साधुमार्गी जैन श्रीसंघ, सूरत ने कहा ''संघ ने कानूनी अड़चन को दूर किया। शिकायतकर्ता रिश्तेदार ने भी शिकायत वापस लेने के साथ समाज के समक्ष क्षमा-याचना की है। इसके बाद आचार्यश्री ने अनामिका जी को दीक्षित किया। यदि इसके बाद भी कोई कानूनी अड़चन या परेशानी आएगी तो श्री संघ विधिक माध्यम से पक्ष रखेगा।''

इन तीन आधार पर दूर हुई कानूनी अड़चन 
- संविधान में धर्म का पालन और धर्म संगत आचरण करने का प्रत्येक नागरिक को मौलिक अधिकार है। कोई भी राज्य सत्ता या शासन नागरिकों के इस मौलिक अधिकारों में दखल नहीं दे सकता। 
- अनामिका के पिता अशोक चंडालिया के परिवार के एक सदस्य (जिन्होंने शिकायत की, नाम का खुलासा नहीं) ने सूरत पहुंच शिकायत वापस लेने की जानकारी दी। लिखित में पत्र सौंप समाजजनों के समक्ष क्षमा-याचना की। कार्रवाई नहीं चाहने के संबंध में स्वीकृति प्रदान की। 
- सूरत श्रीसंघ व समाज के कोलकाता निवासी उच्चतम न्यायालय के अभिभाषक नीलेश बांठिया ने कमिश्नर व अन्य अधिकारियों के समक्ष विधिक पक्ष रखा। उल्लघंन की दशा में न्यायालयीन कार्रवाई में जवाब देने की स्वीकारोक्ति दी।

 

जड़-चेतन सबमें मौजूद शिवशक्ति-तत्व कालातीत है ... देश, काल से ऊपर है । शक्ति के बिना शिव भी शव हैं, जड़ हैं । वेद में कहा गया है मातृशक्ति दिव्यलोक से पितरों द्वारा प्रेरित हो इस मर्त्यलोक के कर्मक्षेत्र में जीवनयज्ञ चलाने आती है । मातृशक्ति ... मातृत्वभाव ... जननी ... शाश्वत-शक्ति ... स्त्री ... । सृष्टि का सृजन, पालन एवं संहार करने वाली उसी सर्वशक्तिमना की उपासना के लिए हमारे यहाँ साल में दो नवरात्रियों को अति प्रशस्त माना गया है । ये दोनों नवरात्र क्रमशः चैत्र, और अश्विन मास में मनाए जाते हैं । आद्याशक्तिनी की उपासना का यह पर्व शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथिओं, नौ नक्षत्रों, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के संग सनातन काल से हीं मनाया जाता है । इन दोनों नवरात्रियों के अलावा दो और गुप्त नवरात्र भी होता है जिसके बारे में बहुत हीं कम लोगों को जानकारी है यह नवरात्र क्रमशः पौष एवं आषाढ़ मास में पड़ता है । नवरात्रि में महाशक्ति उपासना की जाती है । तंत्रागम के अनुसार शक्ति की महिमा "दुर्गम" है इसीलिए उन्हें "दुर्गा" कहते हैं । हम सब जानते हैं कि जहाँ समस्त देवतागण आततायी राक्षसों के समक्ष बलहीन तथा उर्जाहीन हो गए थे वहीँ शक्ति ने साक्षात दुर्गभीमा का रूप धरकर आसानी से सभी आततायियों का संहार कर दिया था । शक्ति हमारे भीतर है, बाहर है, आसपास है, सर्वत्र है । यह तो महसूस करने की चीज है, हम सबके अन्दर जो शक्ति है किसकी है ? यह उसी आदिशक्ति की छाया है । द्वेष, अज्ञान, झूठ, प्रपंच, जड़ता ... ये सब नकारात्मक चीज़ें शक्तिनी महाकालिका के रौद्र रूप के समक्ष भस्म हो जाती हैं । यह शुद्ध शाश्वत अनुभूति है । हमारे यहाँ सदियों से नवरात्रि में आद्याशक्ति भवानी का अनुष्ठान, साधना एवं उपासना का पावन पर्व मनाया जाता रहा है । किन्तु देखा जाय तो बदलती सामाजिक - सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार नवरात्रि में शक्ति-पूजा के रूप-स्वरुप में अब काफी परिवर्तन आ गया है । अब यह आतंरिक शुद्धिकरण की बजाय व्यर्थ आडम्बर एवं दिखावे की पूजा ज्यादा हो गई है । लाउडस्पीकर पर शोर गुल फैलाने से कुछ नहीं होगा वैसे भी जब उपासना के नाम के संग हीं ''रात्रि'' ( नव+रात्रि ) शब्द जुड़ा हुआ है तो इसका अर्थ बेहद गहन हो जाता है यह केवल दिन के समय किया जाने वाला कर्म कांड नहीं बल्कि रात्रि के समय की जाने वाली गुप्त आन्तरिक साधना का नाम है । उच्च आध्यात्मिक शक्तियों को जगाने के लिए सच्चे साधक सारी-सारी रात बीज-मन्त्रों अथवा त्राटक का आन्तरिक अभ्यास करते हैं यौगिक शक्ति की प्राप्ति के लिए इन विशेष मुहूर्तवाली रात्रिओं में की जानेवाली साधना सदियों से फलदायी मानी जाती रही है । हाँ, पर साधना मन की होनी चाहिए आडम्बरों की नहीं । साधना में सच्चाई होनी चाहिए तभी वह फलित होती है । मिट्टी की प्रतिमा बनाकर नौ दिनों तक आडम्बर करने से कुछ नहीं होगा जब तक कि भावनाओं में सत्यता नहीं होगी । एक नारी की कोमलता को अक्षमता समझना, मार्दव को मज़बूरी मानना, बलाघात का अस्त्र चलाकर उसके स्त्रीत्व का अपमान करना, जन्मदात्री की भ्रूणहत्या का महापाप करना अथवा कुल कुटुंब की दुहाई देकर जीवनपर्यन्त उसका शोषण करना अगर आपको कहीं से भी अनुचित नहीं लगता, एक स्त्री में अगर आपको मातृशक्ति नहीं दिखती, एक बालिका में अगर आपको पुत्रीवत छवि दृष्टिगोचर नहीं होती तो मैं समझती हूँ कि आपकी नौ दिनों की साधना बेकार है, व्रत फलाहार सब ढोंग है । मैं पूछती हूँ कि जब आपके अन्दर भावना की दृष्टि हीं अनुपस्थित है तो नौ दिनों तक पूजा पाठ, व्रत उपवास, ब्रह्मचर्यं, दान-दक्षिणा का क्या अर्थ निकलता है ... केवल शून्य हीं न ?

- कंचन पाठक.
साहित्यकार, स्तम्भकार


रजनी खेतान
इंदौर

परशुराम राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका और भृगुवंशीय जमदग्नि के पुत्र, विष्णु के अवतार और शिव के परम भक्त थे। इन्हें शिव से विशेष परशु प्राप्त हुआ था। इनका नाम तो राम था, किन्तु शंकर द्वारा प्रदत्त अमोघ परशु को सदैव धारण किये रहने के कारण ये परशुराम कहलाते थे। विष्णु के दस अवतारों में से छठा अवतार, जो वामन एवं रामचन्द्र के मध्य में गिना जाता है। जमदग्नि के पुत्र होने के कारण ये 'जामदग्न्य' भी कहे जाते हैं। इनका जन्म अक्षय तृतीया, (वैशाख शुक्ल तृतीया) को हुआ था। अत: इस दिन व्रत करने और उत्सव मनाने की प्रथा है। परम्परा के अनुसार इन्होंने क्षत्रियों का अनेक बार विनाश किया। क्षत्रियों के अहंकारपूर्ण दमन से विश्व को मुक्ति दिलाने के लिए इनका जन्म हुआ था।

जन्म कथा
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भृगु ऋषि ने एक बार प्रसन्न होकर अपनी पुत्रवधू से वर माँगने को कहा। उनसे सत्यवती ने अपने तथा अपनी माता के लिए पुत्र जन्म की कामना की। भृगु ने उन दोनों को 'चरु' भक्षणार्थ दिये तथा कहा कि ऋतुकाल के उपरान्त स्नान करके सत्यवती गूलर के पेड़ तथा उसकी माता पीपल के पेड़ का आलिंगन करे तो दोनों को पुत्र प्राप्त होंगे। माँ-बेटी के चरु खाने में उलट-फेर हो गयी। दिव्य दृष्टि से देखकर भृगु पुनः वहाँ पधारे तथा उन्होंन सत्यवती से कहा कि तुम्हारी माता का पुत्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणोचित व्यवहार करेगा तथा तुम्हारा बेटा ब्राह्मणोचित होकर भी क्षत्रियोचित आचार-विचार वाला होगा। बहुत अनुनय-विनय करने पर भृगु ने मान लिया कि सत्यवती का बेटा ब्राह्मणोचित रहेगा किंतु पोता क्षत्रियों की तरह कार्य करने वाला होगा।

सत्यवती के पुत्र जमदग्नि मुनि हुए। उन्होंने राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका से विवाह किया। रेणुका के पाँच पुत्र हुए—
रुमण्वान
सुषेण
वसु
विश्वावसु तथा
पाँचवें पुत्र का नाम परशुराम था।
वही क्षत्रियोचित आचार-विचार वाला पुत्र था। एक बार सद्यस्नाता रेणुका राजा चित्ररथ पर मुग्ध हो गयी। उसके आश्रम पहुँचने पर मुनि को दिव्य ज्ञान से समस्त घटना ज्ञात हो गयी। उन्होंने क्रोध के आवेश में बारी-बारी से अपने चार बेटों को माँ की हत्या करने का आदेश दिया। किंतु कोई भी तैयार नहीं हुआ। जमदग्नि ने अपने चारों पुत्रों को जड़बुद्ध होने का शाप दिया। परशुराम ने तुरन्त पिता की आज्ञा का पालन किया। जमदग्नि ने प्रसन्न होकर उसे वर माँगने के लिए कहा। परशुराम ने पहले वर से माँ का पुनर्जीवन माँगा और फिर अपने भाईयों को क्षमा कर देने के लिए कहा। जमदग्नि ऋषि ने परशुराम से कहा कि वो अमर रहेगा। एक दिन जब परशुराम बाहर गये थे तो कार्तवीर्य अर्जुन उनकी कुटिया पर आये। युद्ध के मद में उन्होंने रेणुका का अपमान किया तथा उसके बछड़ों का हरण करक चले गये। गाय रंभाती रह गयी। परशुराम को मालूम पड़ा तो क्रुद्ध होकर उन्होंने सहस्रबाहु हैहयराज को मार डाला। हैहयराज के पुत्र ने आश्रम पर धावा बोला तथा परशुराम की अनुपस्थिति में मुनि जमदग्नि को मार डाला। परशुराम घर पहुँचे तो बहुत दुखी हुए तथा पृथ्वी का क्षत्रियहीन करने का संकल्प किया। अतः परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी के समस्त क्षत्रियों का संहार किया। समंत पंचक क्षेत्र में पाँच रुधिर के कुंड भर दिये। क्षत्रियों के रुधिर से परशुराम ने अपने पितरों का तर्पण किया। उस समय ऋचीक साक्षात प्रकट हुए तथा उन्होंने परशुराम को ऐसा कार्य करने से रोका। ऋत्विजों को दक्षिणा में पृथ्वी प्रदान की। ब्राह्मणों ने कश्यप की आज्ञा से उस वेदी को खंड-खंड करके बाँट लिया, अतः वे ब्राह्मण जिन्होंने वेदी को परस्पर बाँट लिया था, खांडवायन कहलाये।

अत्यंत क्रोधी स्वभाव
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एक बार उनकी माँ जल का कलश लेकर भरने के लिए नदी पर गयीं। वहाँ गंधर्व चित्ररथ अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा कर रहा था। उसे देखने में रेणुका इतनी तन्मय हो गयी कि जल लाने में विलंब हो गया तथा यज्ञ का समय व्यतीत हो गया। उसकी मानसिक स्थिति समझकर जमदग्नि ने अपने पुत्रों को उसका वध करने के लिए कहा। परशुराम के अतिरिक्त कोई भी ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हुआ। पिता के कहने से परशुराम ने माँ का वध कर दिया। पिता के प्रसन्न होने पर उन्होंने वरदान स्वरूप उनका जीवित होना माँगा। परशुराम के पिता ने क्रोध के आवेश में बारी-बारी से अपने चारों बेटों को माँ की हत्या करने का आदेश दिया। परशुराम के अतिरिक्त कोई भी तैयार न हुआ। अत: जमदग्नि ने सबको संज्ञाहीन कर दिया। परशुराम ने पिता की आज्ञा मानकर माता का शीश काट डाला। पिता ने प्रसन्न होकर वर माँगने को कहा तो उन्होंने चार वरदान माँगे-
माँ पुनर्जीवित हो जायँ,
उन्हें मरने की स्मृति न रहे,
भाई चेतना-युक्त हो जायँ और
मैं परमायु होऊँ।
जमदग्नि ने उन्हें चारों वरदान दे दिये।

क्रोधी स्वभाव्
दुर्वासा की भाँति ये भी अपने क्रोधी स्वभाव के लिए विख्यात है। एक बार कार्तवीर्य ने परशुराम की अनुपस्थिति में आश्रम उजाड़ डाला था, जिससे परशुराम ने क्रोधित हो उसकी सहस्त्र भुजाओं को काट डाला। कार्तवीर्य के सम्बन्धियों ने प्रतिशोध की भावना से जमदग्नि का वध कर दिया। इस पर परशुराम ने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय-विहीन कर दिया (हर बार हताहत क्षत्रियों की पत्नियाँ जीवित रहीं और नई पीढ़ी को जन्म दिया) और पाँच झीलों को रक्त से भर दिया। अंत में पितरों की आकाशवाणी सुनकर उन्होंने क्षत्रियों से युद्ध करना छोड़कर तपस्या की ओर ध्यान लगाया। रामावतार में रामचन्द्र द्वारा शिव का धनुष तोड़ने पर ये क्रुद्ध होकर आये थे। इन्होंने परीक्षा के लिए उनका धनुष रामचन्द्र को दिया। जब राम ने धनुष चढ़ा दिया तो परशुराम समझ गये कि रामचन्द्र विष्णु के अवतार हैं। इसलिए उनकी वन्दना करके वे तपस्या करने चले गये। 'कहि जय जय रघुकुल केतू। भुगुपति गए बनहि तप हेतु॥' यह वर्णन 'राम चरितमानस', प्रथम सोपान में भी मिलता है।

राम के पराक्रम की परीक्षा
राम का पराक्रम सुनकर वे अयोध्या गये। दशरथ ने उनके स्वागतार्थ रामचन्द्र को भेजा। उन्हें देखते ही परशुराम ने उनके पराक्रम की परीक्षा लेनी चाही। अतः उन्हें क्षत्रियसंहारक दिव्य धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए कहा। राम के ऐसा कर लेने पर उन्हें धनुष पर एक दिव्य बाण चढ़ाकर दिखाने के लिए कहा। राम ने वह बाण चढ़ाकर परशुराम के तेज़ पर छोड़ दिया। बाण उनके तेज़ को छीनकर पुनः राम के पास लौट आया। राम ने परशुराम को दिव्य दृष्टि दी। जिससे उन्होंने राम के यथार्थ स्वरूप के दर्शन किये। परशुराम एक वर्ष तक लज्जित, तेजहीन तथा अभिमानशून्य होकर तपस्या में लगे रहे। तदनंतर पितरों से प्रेरणा पाकर उन्होंने वधूसर नामक नदी के तीर्थ पर स्नान करके अपना तेज़ पुनः प्राप्त किया।

परशुराम कुंड
असम राज्य की उत्तरी-पूर्वी सीमा में जहाँ ब्रह्मपुत्र नदी भारत में प्रवेश करती है, वहीं परशुराम कुण्ड है, जहाँ तप करके उन्होंने शिवजी से परशु प्राप्त किया था। वहीं पर उसे विसर्जित भी किया। परशुराम जी भी सात चिरंजीवियों में से एक हैं। इनका पाठ करने से दीर्घायु प्राप्त होती है। परशुराम कुंड नामक तीर्थस्थान में पाँच कुंड बने हुए हैं। परशुराम ने समस्त क्षत्रियों का संहार करके उन कुंडों की स्थापना की थी तथा अपने पितरों से वर प्राप्त किया था कि क्षत्रिय संहार के पाप से मुक्त हो जायेंगे।

रामकथा में परशुराम
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चारों पुत्रों के विवाह के उपरान्त राजा दशरथ अपनी विशाल सेना और पुत्रों के साथ अयोध्या पुरी के लिये चल पड़े। मार्ग में अत्यन्त क्रुद्ध तेजस्वी महात्मा परशुराम मिले। उन्होंने राम से कहा कि वे उसकी पराक्रम गाथा सुन चुके हैं, पर राम उनके हाथ का धनुष चढ़ाकर दिखाएँ। तदुपरान्त उनके पराक्रम से संतुष्ट होकर वे राम को द्वंद्व युद्ध के लिए आमंत्रित करेंगे। दशरथ अनेक प्रयत्नों के उपरान्त भी ब्राह्मणदेव परशुराम को शान्त नहीं कर पाये। परशुराम ने बतलाया कि 'विश्वकर्मा ने अत्यन्त श्रेष्ठ कोटि के दो धनुषों का निर्माण किया था। उनमें से एक तो देवताओं ने शिव को अर्पित कर दिया था और दूसरा विष्णु को। एक बार देवताओं के यह पूछने पर कि शिव और विष्णु में कौन बलबान है, कौन निर्बल- ब्रह्मा ने मतभेद स्थापित कर दिया। फलस्वरूप विष्णु की धनुष टंकार के सम्मुख शिव धनुष शिथिल पड़ गया था, अतः पराक्रम की वास्तविक परीक्षा इसी धनुष से हो सकती है। शान्त होने पर शिव ने अपना धनुष विदेह वंशज देवरात को और विष्णु ने अपना धनुष भृगुवंशी ऋचीक को धरोहर के रूप में दिया था, जो कि मेरे पास सुरक्षित है।'

राम ने क्रुद्ध होकर उनके हाथ से धनुष बाण लेकर चढ़ा दिया और बोले - 'विष्णुबाण व्यर्थ नहीं जा सकता। अब इसका प्रयोग कहाँ पर किया जाये।' परशुराम का बल तत्काल लुप्त हो गया। उनके कथनानुसार राम ने बाण का प्रयोग परशुराम के तपोबल से जीते हुए अनेक लोकों पर किया, जो कि नष्ट हो गये। परशुराम ने कहा - 'हे राम, आप निश्चय ही साक्षात विष्णु हैं।' तथा परशुराम ने महेन्द्र पर्वत के लिए प्रस्थान किया। राम आदि अयोध्या की ओर बढ़े। उन्होंने यह धनुष वरुण देव को दे दिया। परशुराम की छोड़ी हुई सेना ने भी राम आदि के साथ प्रस्थान किया।

कथा: पिता का आदेश

नारायण ने ही भृगुवंश में परशुराम रूप में अवतार धारण किया था। उन्होंने जंभासुर का मस्तक विदीर्ण किया। शतदुंदभि को मारा। उन्होंने युद्ध में हैहयराज अर्जुन को मारा तथा केवल धनुष की सहायता से सरस्वती नदी के तट पर हज़ारों ब्राह्मण वेशी क्षत्रियों को मार डाला। एक बार कार्तवीर्य अर्जुन ने बाणों से समुद्र को त्रस्त कर किसी परम वीर के विषय में पूछा। समुद्र ने उसे परशुराम से लड़ने को कहा। परशुराम को उसने अपने व्यवहार से बहुत रुष्ट कर दिया। अतः परशुराम ने उसकी हज़ार भुजाएँ काट डालीं। अनेक क्षत्रिय युद्ध के लिए आ जुटे। परशुराम क्षत्रियों से रुष्ट हो गये, अतः उन्होंने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर डाला। अंत में पितरों की आकाशवाणी सुनकर उन्होंने क्षत्रियों से युद्ध करना छोड़कर तपस्या की ओर ध्यान लगाया।

वे सौ वर्षों तक सौम नामक विमान पर बैठे हुए शाल्व से युद्ध करते रहे किंतु गीत गीत गाती हुई नग्निका (कन्या) कुमारियों के मुंह से यह सुनकर कि शाल्व का वध प्रद्युम्न और साँब को साथ लेकर विष्णु करेंगे, उन्हें विश्वास हो गया, अतः वे तभी से वन में जाकर अपने अस्त्र शस्त्र इत्यादि पानी में डुबोकर कृष्णावतार की प्रतीक्षा में तपस्या करने लगे।

परशुराम और यज्ञ
परशुराम ने अपने जीवनकाल में अनेक यज्ञ किए। यज्ञ करने के लिए उन्होंने बत्तीस हाथ ऊँची सोने की वेदी बनवायी थी। महर्षि कश्यप ने दक्षिण में पृथ्वी सहित उस वेदी को ले लिया तथा फिर परशुराम से पृथ्वी छोड़कर चले जाने के लिए कहा। परशुराम ने समुद्र पीछे हटाकर गिरिश्रेष्ठ महेंद्र पर निवास किया।

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रजनी खेतान
इंदौर
 

अजमेर 27 अप्रेल। हज़रत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह में दुनिया भर से हर धर्म और प्रांत के लोग हाज़री देते है। दरबारे ख्वाजा में हाज़िर होने वाले जात-पात ओर भेद भाव को बाहर ही छोड़कर आते है। आज देश के विभिन्न स्थानों में पैदल यात्रा करने वाली जैन समाज की साध्वियां भी अजमेर दरगाह पहुंचीं,यहां पहुंचकर साध्वियों के 8 सदस्य दल ने ख्वाजा गरीब नवाज की चौखट चूमी। साध्वियों के 8 सदस्य दल ने मज़ारे ख्वाजा की ज़ियारत की। दरगाह के ख़ादिम सैय्यद यामीन हाशमी ने इन साध्वियों को हाज़िरी दिलवाई। हाज़री के बाद ख़ादिम यामीन हाशमी ने साध्वियों को दरगाह के मुवमेटों दिए। हाज़री के बाद जैन साध्वी ने पत्रकारों से बात चीत करते हुए दरगाह आने पर खुशी जाहिर की। ओर कहा कि इस दरबार के बारे में बहुत लोगो से सुना था बरसों से तमन्ना थी कि ख्वाजा साहब की दरगाह देखे आज यहां आकर देखा कि यहां किसी भी धर्म मे कोई भेद भाव नही रखा जाता है। जिस तरह जैन धर्म अहिंसा पर चलने वाला धर्म है इस्लाम भी अहिंसा पसंद धर्म है। यहां के लोग दरगाह आने वालों का सम्मान करते है।

हुबली 27 अप्रेल । राष्ट्र-संत श्री ललितप्रभ सागर जी महाराज ने कहा कि जिस घर में हम 23 घंटे रहते हैं वहाँ तो हो-हल्ला करते हैं और जिस मंदिर-स्थानक में केवल आधा-एक घंटा बिताते हैं वहाँ बड़े शांत रहते हैं। कितना अच्छा हो कि हम घर को ही अपना मंदिर मानना शुरू कर दें और धर्म की शुरुआत मंदिर-मस्जिद की बजाय घर से करना शुरू कर दे तो हमारे 24 के 24 घंटे धन्य हो जाएंगे। केवल हाथों में पुखराज, मोती या नीलम पहनने से कुछ न होगा। ग्रह-गोचरों की शांति तभी होगी जब व्यक्ति अपने घर में प्रेम की मुरलियाँ बजाएगा।


संतप्रवर हजारों श्रद्धालुओं से खचाखच भरे गोल्ड जिम हॉल में श्री आदिनाथ जिन मंदिर एवं दादावाड़ी ट्रस्ट द्वारा आयोजित सत्संगमाला के दौरान घर को कैसे स्वर्ग बनाएं विषय पर संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आजकल घरों में भाई-भाई, देराणी-जेठाणी, सास-बहू अलग-अलग कमरों में रहते हैं, वे आपस में बोलते नहीं, बतियाते नहीं, एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराते नहीं, सुख-दुख में काम आते नहीं ठीक वैसे ही जैसे कब्रिस्तान की कमरों में लोग रहते हैं। वे भी आपस में कोई व्यवहार नहीं करते, अगर दोनों की यही हालत है तो फिर घरों के कमरों में और कब्रिस्तान की कब्रों में फर्क ही कहाँ रह जाता है? उन्होंने कहा कि प्लीज, अपने घर के कमरों को कब्रें मत बनाइए। उन्होंने कहा कि पहले लोगों के पास मकान छोटे होते थे, पर दिल बड़े सो चार-चार भाई भी साथ रह लेते थे और आज व्यक्ति ने मकान तो बड़ा बना लिया, पर दिल छोटा कर लिया परिणाम अब दो भाई भी साथ रह नहीं पा रहे हैं। अगर दिल को छोटा रखेंगे तो हमारे परिवारों की हालत पानी सुख चुके तालाब की तरह हो जाएगी जहाँ दरारों के अलावा कुछ नहीं बचेगा।


घर में ही है स्वर्ग और नर्क-संतश्री ने कहा कि स्वर्ग किसी आसमान में और पाताल किसी नरक में नहीं होता। जिस घर में चार बेटे-बहुओं में माता-पिता की सेवा के लिए तरसते रहते हैं, अपने हाथों से रोटी चूरकर उन्हें खिलाते हैं वह घर का धरती का जीता-जागता स्वर्ग है। जिस घर में बूढ़े माँ-बाप को अपने हाथों से खाना बनाकर खाना पड़ता हो वह घर साक्षात नरक है। आजकल अमीर घरों में लोग माता-पिता की सेवा के लिए नौकर रखते हैं, लेकिन मैं उन्हें पूछना चाहूँगा कि जब पत्नी से प्यार करना होता है तो वे किन्हीं नौकरों को बुलाते हैं क्या? जब प्यार खुद करते हो तो सेवा औरों से क्यों?


सेवाभावी संस्थाओं के सदस्यों से संतश्री ने अपील की कि लॉयन्स क्लब या किसी रोटरी क्लब के सदस्य बनकर वृद्धाश्रम, अस्पताल या भिखारियों की सेवा करना आसान है, पर घर बैठे माँ-बाप की सेवा करना मुश्किल है। आपकी सेवा के पहले हकदार बाहर के नहीं घर के बूढ़े लोग है। सोचो, जिन पत्थर की मूर्तियों को हम बनाते हैं उनकी तो हम खूब पूजा करते हैं, पर जो माँ-बाप हमें बनाते हैं उनकी पूजा करने से हम क्यों कतराते हैं? याद रखें, बेटा वो नहीं होता जिसे माँ-बाप जन्म देते हैं, असली सपूत तो वो होता है जो बुढ़ापे में माँ-बाप की सेवा करता है। चुटकी लेते हुए संतश्री ने बहुओं से कहा कि आप सब कुछ पीहर से लेकर आईं, पर क्या पति को भी दहेज में पीहर से साथ लेकर आई थीं अगर नहीं तो जितने साल का पति आपको मिला है उतने साल तक सास-ससुर को निभाने का बड़प्पन अवश्य दिखा दिजिएगा। आज आपने उन्हें भाग्य भरोसे छोड़ रखा है सोचो, उन्होंने भी तुम्हे जन्म देते ही भाग्य भरोसे छोड़ दिया होता तो आज तुम किसी अनाथालय में पल रहे होते। जब हमने पहली साँस ली तो हमारे साथ माँ थी इसलिए हमारा यह दायित्व है कि जब उसकी अंतिम साँस निकले तो हम उसके पास हो।


रिश्तों में प्रेम और त्याग के बीज बोएं-संतश्री ने कहा कि अगर घर के लोग लकड़ी के गठ्ठर की तरह साथ-साथ रहंगे तो दुनिया की कोई भी ताकत उन्हें हिला नहीं पाएगी, पर वे लकडियों की तरह अलग-अलग हो गए तो पड़ोसी भी उन पर हावी हो जाएगा। आज रिश्तों में प्रेम, भाईचारा और त्याग के बीजों को बोने की जरूरत है ताकि परिवार में आनंद की फसलें लहलहा सके। चुटकी लेते हुए संतश्री ने कहा कि आजकल सास-बहू में न बनने के कारण बेटे माँ-बाप को गाँवों में रखने लगे हैं। घर में माँ का कहीं अतापता नहीं और लोग घर का नाम मातृछाया रखते हैं। वे लोग नाम बदलकर पत्नीछाया रख दे। जिस घर पर पत्नी के अलावा किसी की छाया नहीं पड़ती उस घर का नाम मातृछाया रखने का क्या मतलब?हम सब साथ-साथ है का नारा अपनाने की सीख देते हुए भाई-भाई के साथ का जो सुख है वह तो स्वर्गलोक में भी नहीं है। अगर एक तरफ मंदिर की प्रतिष्ठा में 5 लाख का चढ़ावा बोलना हो और दूसरी तरफ कमजोर भाई को व्यापार के लिए 5 लाख का सहयोग करना हो तो पहले भाई की सहायता कीजिएगा क्योंकि ऊपरवाला चढ़ावे से नहीं भाई का सहयोग करने से खुश होगा। समाज को जोड़ने वाला सच्चा संत-संतश्री ने कहा कि जो समाज को जोड़े वही सच्चा संत है। तोडने वाला कभी सच्चा संत नहीं हो सकता। हम समाज में ऐसे संतों को बार-बार बुलाए जो एकता में विश्वास रखते हो। हम समाज को नारंगी की बजाय खरबूजा बनाएं जो बाहर से भले ही अलग दिखाई देता है, पर छिलके उतरते ही एक हो जाता है। उन्होंने कहा कि हुबली में जो धार्मिक समरसता का जो माहौल बना है, उसे देखकर हम अभिभूत हैं। भगवान करे इसे कभी नजर न लगे।


घर को स्वर्ग बनाए का भजन सुनाया- जब संतप्रवर ने आओ, कुछ ऐसे काम करें जो घर को स्वर्ग बनाएं, हमसे जो टूट गए रिश्ते हम उनमें साँध लगाएं, हम अपना फर्ज निभाएं भजन सुनाया तो सत्संगप्रेमियों का हृदय भीग उठा। प्रवचन से प्रेरित होकर हजारों युवाओं ने प्रतिदिन माता-पिता को प्रतिदिन पंचांग प्रणाम करने का संकल्प लिया। इससे पूर्व कार्यक्रम की शुरुआत मुनि शांतिप्रिय सागर महाराज ने सामूहिक प्रार्थना से करवाई। इस अवसर पर लाभार्थी रमे बाफना, दादावाड़ी के प्रकाश छाजेड़, दिनेश संघवी, रतिलाल भाई जैन, सम्पतराज कटारिया, कोटूर संघ अध्यक्ष बाबूलाल जी बाफना, रामकृष्ण जी पालेकर, पारसमल जी मांडोत, बाबुलाल जी मुणोत गोल्ड जिम परिवार, पूना के गुरुभक्त विशाल लोढ़ा एवं श्रीपाल छाजेड़ और बागलकोट संघ के सदस्यों ने दीप प्रज्वलित किया।

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