धर्म आस्था (22)

धर्म आस्था

रजनी खेतान
इंदौर

*द्वादश ज्योर्लिंग स्तोत्र व अर्थ....

*सौराष्ट्रदेशे विशदेsतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम ।*
*भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये ।।१।।*

*अर्थात*​ – जो शिव अपनी भक्ति प्रदन करने के लिए सौराष्ट्र प्रदेश में दयापूर्वक अवतरित हुए हैं, चंद्रमा जिनके मस्तक का आभूषण बना है, उन ज्योतिर्लिंग स्वरुप भगवान श्री सोमनाथ की शरण में मैं जाता हूँ.

*श्रीशैलश्रृंगे विबुधातिसंगेतुलाद्रितुंगेsपि मुदा वसन्तम ।*
*तमर्जुनं मल्लिकापूर्वमेकं नमामि संसारसमुद्रसेतुम ।।२।।*

*अर्थात​* – जो ऊँचाई के आदर्शभूत पर्वतों से भी बढ़कर ऊँचे श्री शैल के शिखर पर, जहाँ देवताओं का अत्यन्त समागम रहता है, प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं तथा जो संसार-सागर से पार कराने के लिए पुल के समान है, उन एकमात्र प्रभु मल्लिकार्जुन को मैं नमस्कार करता हूँ।

*अवन्तिकायां विहितावतारंमुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम ।*
*अकालमृत्यो: परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम ।।३।।*

*अर्थात​* – संतजनो को मोक्ष देने के लिए जिन्होंने अवन्तिपुरी (वर्तमान में उज्जैन) में अवतार धारण किया है, उन महाकाल नाम से विख्यात महादेवजी को मैं अकाल मृत्यु से बचाने के लिए प्रणाम करता हूँ.

*कावेरिकानर्मदयो: पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय ।*
*सदैव मान्धातृपुरे वसन्तमोंकारमीशं शिवमेकमीडे ।।४।।*

*अर्थात​*– जो सत्पुरुषो को संसार सागर से पार उतारने के लिए कावेरी और नर्मदा के पवित्र संगम के निकट मान्धाता के पुर में सदा निवास करते हैं, उन अद्वित्तीय कल्याणमय भगवान ऊँकारेश्वर का मैं स्तवन करता हूँ.

*पूर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधाने सदा वसन्तं गिरिजासमेतम ।*
*सुरासुराराधितपादपद्मं श्रीवैद्यनाथं तमहं नमामि ।।५।।*

*अर्थात​* – जो पूर्वोत्तर दिशा में चिताभूमि (वर्तमान में वैद्यनाथ धाम) के भीतर सदा ही गिरिजा के साथ वास करते हैं, देवता और असुर जिनके चरण कमलों की आराधना करते हैं, उन श्री वैद्यनाथ को मैं प्रणाम करता हूँ.

*याम्ये सदंगे नगरेsतिरम्ये विभूषितांग विविधैश्च भोगै: ।*
*सद्भक्तिमुक्तिप्रदमीशमेकं श्रीनागनाथं शरणं प्रपद्ये ।।६।।*

*अर्थात​* – जो दक्षिण के अत्यन्त रमणीय सदंग नगर में विविध भोगो से संपन्न होकर आभूषणों से भूषित हो रहे हैं, जो एकमात्र सदभक्ति और मुक्ति को देने वाले हैं, उन प्रभु श्रीनागनाथ जी की शरण में मैं जाता हूँ.

*महाद्रिपार्श्चे च तट रमन्तं सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रै: ।*
*सुरासुरैर्यक्षमहोरगाद्यै: केदारमीशं शिवमेकमीडे ।।७।।*

*अर्थात​* – जो महागिरि हिमालय के पास केदारश्रृंग के तट पर सदा निवास करते हुए मुनीश्वरो द्वारा पूजित होते हैं तथा देवता, असुर, यज्ञ और महान सर्प आदि भी जिनकी पूजा करते हैं, उन एक कल्याणकारक भगवान केदारनाथ का मैं स्तवन करता हूँ.

*सह्याद्रिशीर्षे विमले वसन्तं गोदावरीतीरपवित्रदेशे ।*
*यद्दर्शनात्पातकमाशु नाशं प्रयाति तं त्र्यम्बकमीशमीडे ।।८।।*

*अर्थात​* – जो गोदावरी तट के पवित्र देश में सह्य पर्वत के विमल शिखर पर वास करते हैं, जिनके दर्शन से तुरन्त ही पातक नष्ट हो जाता है, उन श्री त्र्यम्बकेश्वर का मैं स्तवन करता हूँ.

*सुताम्रपर्णीजलराशियोगे निबध्य सेतुं विशिखैरसंख्यै: ।*
*श्रीरामचन्द्रेण समर्पितं तं रामेश्वराख्यं नियतं नमामि ।।९।।*

*अर्थात​* – जो भगवान श्री रामचन्द्र जी के द्वारा ताम्रपर्णी और सागर के संगम में अनेक बाणों द्वारा पुल बाँधकर स्थापित किये गए, उन श्री रामेश्वर को मैं नियम से प्रणाम करता हूँ.

*यं डाकिनीशाकिनिकासमाजे निषेव्यमाणं पिशिताशनैश्च ।*
*सदैव भीमादिपदप्रसिद्धं तं शंकरं भक्तहितं नमामि ।।१०।।*

*अर्थात​* – जो डाकिनी और शाकिनी वृन्द में प्रेतों द्वारा सदैव सेवित होते हैं, उन भक्ति हितकारी भगवान भीम शंकर को मैं प्रणाम करता हूँ.

*सानन्दमानन्दवने वसन्तमानन्दकन्दं हतपापवृन्दम ।*
*वाराणसीनाथमनाथनाथं श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये ।।११।।*

*अर्थात*​ – जो स्वयं आनंद कन्द हैं और आनंदपूर्वक आनन्द वन (वर्तमान में काशी) में वास करते हैं, जो पाप समूह के नाश करने वाले हैं, उन अनाथों के नाथ काशीपति श्री विश्वनाथ की शरण में मैं जाता हूँ.

*इलापुरे रम्यविशालकेsस्मिन समुल्लसन्तं च जगद्वरेण्यम ।*
*वन्दे महोदारतरस्वभावं घृष्णे श्वराख्यं शरणं प्रपद्ये ।।१२।।*

*अर्थात* – जो इलापुर के सुरम्य मंदिर में विराजमान होकर समस्त जगत के आराधनीय हो रहे हैं, जिनका स्वभाव बड़ा ही उदार है, उन घृष्णेश्वर नामक ज्योतिर्मय भगवान शिव की शरण में मैं जाता हूँ.

*ज्योतिर्मयद्वादशलिंगानां शिवात्मनां प्रोक्तमिदं क्रमेण ।*
*स्तोत्रं पठित्वा मनुजोsतिभक्त्या फलं तदालोक्य निजं भजेच्च ।।१३।।*

*अर्थात​* – यदि मनुष्य क्रमश: कहे गये इन द्वादश ज्योतिर्मय शिव लिंगो के स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करें तो इनके दर्शन से होने वाला फल प्राप्त कर सकता है।

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रजनी खेतान
इंदौर

हुआ चन्द्रप्रभ भगवान का स्वर्ण कलशो से अभिषेक एवं किया गुरुमाँ सुपार्श्वमती माताजी के समाधी स्थल पर चरण पूजन
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माँ सुपार्श्वमती माताजी के जीवन पर आधरित " भंवरी भव के पार " फिल्म के प्रथम पोस्टर का विमोचन हुआ
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जयपुर। अजमेर रोड बढ़ के बालाजी स्थित सुपार्श्व गार्डन सिटी के चंद्रपुरी दिगम्बर जैन मंदिर में बुधवार को प्रातः 6 बजे पूज्य गणिनी आर्यिका गौरवमती माताजी ससंघ सानिध्य में चंद्रपुरी दिगम्बर जैन मंदिर के प्रथम पंचकल्याणक प्रतिष्ठा दिवस एवं पूज्य गुरुमाँ सुपार्श्वमती माताजी का पंचम अन्तर्विलय वर्ष (समाधी दिवस) समारोह मनाया गया.

कालाष्टमी की कालभैरव जयंती या भैरवाष्टमी भी कहते हैं।
कालाष्टमी अथवा काला अष्टमी का हिन्दू धर्म में बड़ा ही महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दौरान इसे मनाया जाता है। 'कालभैरव' के भक्त वर्ष की सभी 'कालाष्टमी' के दिन उनकी पूजा और उनके लिए उपवास करते हैं। सबसे मुख्य 'कालाष्टमी', जिसे 'कालभैरव जयन्ती' के नाम से जाना जाता है, उत्तरी भारतीय पूर्णीमांत पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष के महीने में पड़ती है, जबकि दक्षिणी भारतीय अमांत पंचांग के अनुसार कार्तिक माह में पड़ती है। हालाँकि दोनों पंचांग में 'कालभैरव जयन्ती' एक ही दिन देखी जाती है। माना जाता है कि इसी दिन भगवान शिव 'भैरव' के रूप में प्रकट हुए थे।

व्रत विधि
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भगवान भोलेनाथ के भैरव रूप के स्मरण मात्र से ही सभी प्रकार के पाप और कष्ट दूर हो जाते हैं। भैरव की पूजा व उपासना से मनोवांछित फल मिलता है। अत: भैरव जी की पूजा-अर्चना करने तथा कालाष्टमी के दिन व्रत एवं षोड्षोपचार पूजन करना अत्यंत शुभ एवं फलदायक माना गया है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन कालभैरव का दर्शन एवं पूजन मनवांछित फल प्रदान करता है।
भगवान शिव के भैरव रूप की उपासना करने वाले भक्तों को भैरवनाथ की षोड्षोपचार सहित पूजा करनी चाहिए और उन्हें अर्ध्य देना चाहिए। रात्रि के समय जागरण करके शिवशंकर एवं पार्वती की कथा एवं भजन कीर्तन करना चाहिए। भैरव कथा का श्रवण और मनन करना चाहिए। मध्य रात्रि होने पर शंख, नगाड़ा, घंटा आदि बजाकर भैरव जी की आरती करनी चाहिए। भगवान भैरवनाथ का वाहन 'श्वान' (कुत्ता) है। अत: इस दिन प्रभु की प्रसन्नता हेतु कुत्ते को भोजन कराना चाहिए। हिन्दू मान्यता के अनुसार इस दिन प्रात:काल पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करके पितरों का श्राद्ध व तर्पण करके भैरव जी की पूजा व व्रत करने से समस्त विघ्न समाप्त हो जाते हैं तथा दीर्घायु प्राप्त होती है। भैरव जी की पूजा व भक्ति करने से भूत, पिशाच एवं काल भी दूर रहते हैं। व्यक्ति को कोई रोग आदि स्पर्श नहीं कर पाते। शुद्ध मन एवं आचरण से ये जो भी कार्य करते हैं, उनमें इन्हें सफलता मिलती है।

माहात्म्य
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कालाष्टमी के दिन काल भैरव के साथ-साथ इस दिन देवी कालिका की पूजा-अर्चना एवं व्रत का भी विधान है। काली देवी की उपासना करने वालों को अर्धरात्रि के बाद माँ की उसी प्रकार से पूजा करनी चाहिए, जिस प्रकार दुर्गापूजा में सप्तमी तिथि को देवी कालरात्रि की पूजा का विधान है। भैरव की पूजा-अर्चना करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य की रक्षा भी होती है। भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, काल भैरव स्तोत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच आदि का नियमित पाठ करने से अनेक समस्याओं का निदान होता है। कालभैरव अष्टमी पर भैरव के दर्शन करने से अशुभ कर्मों से मुक्ति मिल जाती है। भैरव उपासना के द्वारा क्रूर ग्रहों के प्रभाव से छुटकारा मिलता है।

कथा
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भैरवाष्टमी या कालाष्टमी की कथा के अनुसार एक समय श्रीहरि विष्णु और ब्रह्मा के मध्य विवाद उत्पन्न हुआ कि उनमें से श्रेष्ठ कौन है। यह विवाद इस हद तक बढ़ गया कि समाधान के लिए भगवान शिव एक सभा का आयोजन करते हैं। इस सभा में महत्त्वपूर्ण ज्ञानी, ऋषि-मुनि, सिद्ध संत आदि उपस्थित थे। सभा में लिए गये एक निर्णय को भगवान विष्णु तो स्वीकार कर लेते हैं, किंतु ब्रह्मा जी इस निर्णय से संतुष्ट नहीं होते। वे महादेव का अपमान करने लगते हैं। शांतचित शिव यह अपमान सहन न कर सके और ब्रह्मा द्वारा अपमानित किये जाने पर उन्होंने रौद्र रुप धारण कर लिया। भगवान शंकर प्रलय के रूप में नज़र आने लगे और उनका रौद्र रुप देखकर तीनों लोक भयभीत हो गए। भगवान शिव के इसी रुद्र रूप से भगवान भैरव प्रकट हुए।[
भैरव जी श्वान पर सवार थे, उनके हाथ में दंड था। हाथ में दण्ड होने के कारण वे 'दण्डाधिपति' कहे गये। भैरव जी का रूप अत्यंत भयंकर था। उनके रूप को देखकर ब्रह्मा जी को अपनी ग़लती का एहसास हुआ। वह भगवान भोलेनाथ एवं भैरव की वंदना करने लगे। भैरव जी ब्रह्मा एवं अन्य देवताओं और साधुओं द्वारा वंदना करने पर शांत हो जाते हैं।

 

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 रजनी खेतान, इंदौर 

बड़े बुज़ुर्ग तिथि देख कर आने जाने की रोक-टोक क्यों करते थे ?
दिशाशूल समझने से पहले हमें दस दिशाओं के विषय में ज्ञान होना आवश्यक है।

सनातन धर्म के ग्रंथों में सदैव 10 दिशाओं का वर्णन किया गया है, जैसे हनुमान जी ने युद्ध स्थल पर इतनी आवाज की कि उनकी आवाज दसों दिशाओं में सुनाई दी |
10 दिशाएँ इस प्रकार हैं :
1) पूर्व 2) पश्चिम 3) उत्तर 4) दक्षिण 5) उत्तर – पूर्व 6) उत्तर – पश्चिम 7) दक्षिण – पूर्व 8) दक्षिण – पश्चिम 9) आकाश 10) पाताल
प्रत्येक दिशा के देवता होते हैं |

दिशाशूल वह दिशा है जिस तरफ यात्रा नहीं करना चाहिए | हर दिन किसी एक दिशा की ओर दिशाशूल होता है |
1) सोमवार और शुक्रवार को पूर्व
2) रविवार और शुक्रवार को पश्चिम
3) मंगलवार और बुधवार को उत्तर
4) गुरुवार को दक्षिण
5) सोमवार और गुरुवार को दक्षिण-पूर्व
6) रविवार और शुक्रवार को दक्षिण-पश्चिम
7) मंगलवार को उत्तर-पश्चिम
8) बुधवार और शनिवार को उत्तर-पूर्व।

यदि एक ही दिन यात्रा करके उसी दिन वापिस आ जाना हो तो ऐसी दशा में दिशाशूल का विचार नहीं किया जाता है परन्तु यदि कोई आवश्यक कार्य हो और उसी दिशा की तरफ यात्रा करनी पड़े, जिस दिन वहाँ दिशाशूल हो तो यह उपाय करके यात्रा कर लेनी चाहिए –
रविवार – दलिया और घी खा कर,
सोमवार – दर्पण देख कर,
मंगलवार – गुड़ खा कर,
बुधवार – तिल, धनिया खा कर,
गुरूवार – दही खा कर,
शुक्रवार – जौ खा कर,
शनिवार – अदरक अथवा उड़द की दाल खा कर।

साधारणतया दिशाशूल का इतना विचार नहीं किया जाता परन्तु यदि व्यक्ति के जीवन का अति महत्वपूर्ण कार्य है तो दिशाशूल का ज्ञान होने से व्यक्ति मार्ग में आने वाली बाधाओं से बच सकता है | आशा करते हैं कि आपके जीवन में भी यह ज्ञान उपयोगी सिद्ध होगा तथा आप इसका लाभ उठाकर अपने दैनिक जीवन में सफलता प्राप्त करेंगे |

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रजनी खेतान, इंदौर 

मंगलवार का दिन और इस बार खास संयोग होने की वजह से हनुमान जयन्ती धूमधाम से मनाई जा रही है। ज्योतिषियों के मुताबिक इस बार नक्षत्रों के सुयोग के दुुर्लभ संयोग बने हैं, जिसके कारण हनुमान जयंती खास है।

ज्योतिषाचार्य शुभम ओझा ने बताया कि आज के दिन खास संयोगयुक्त राज योग सूर्योदय से ही आरंभ हुआ है, जो दिन में 11.38 बजे तक रहा। इसी राजयोग के कारण इस बार की जंयती बहुत खास है। 120 सालों के बाद बाद इस साल की हनुमान जयंती पर बड़े ही खास संयोग बन रहे हैं। इसलिए इस दिन हनुमानजी की पूजा-अर्चना से भक्तों पर ख़ास अनुकम्पा होगी।

हनुमान जी को शिवजी का ग्यारहवां अवतार माना जाता है। हिन्दू मान्यतानुसार रुद्रावतार भगवान हनुमान माता अंजनी और वानर राज केसरी के पुत्र हैं। हनुमान जी की जन्मतिथि पर कई मतभेद हैं लेकिन अधिकतर लोग चैत्र शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को ही हनुमान जयंती के रूप में मानते हैं। हनुमान जी के जन्म का वर्णन वायु- पुराण में किया गया है।

इस दिन वाल्मीकि रामायण तुलसीकृत श्री राम चरित्र मानस के सुंदरकांड का या हनुमान चालीसा के अखंड पाठ का आयोजन करना चाहिए। हनुमान जी का गुणगान भजन एवं कीर्तन करना चाहिए। हनुमान जी के विग्रह का सिंदूर श्रंगार करना चाहिए। नैवेद्य मे गुड, भीगा चना या भुना चना तथा बेसन के लड्डू रखना चाहिए।

मदनगंज-किशनगढ़ । भगवान महावीर स्वामी के 2616 वां जन्म कल्याणक महोत्सव को सकल जैन समाज ने हर्षोल्लास के साथ मनाया।आज सुबह मुनि सुव्रतनाथ पंचायत एवं आदिनाथ दिगम्बर जैन पंचायत के संयुक्त तत्वावधान में चंद्रप्रभु मंदिर से प्रात: 8 बजे भव्य शोभायात्रा निकली। शोभायात्रा ओसवाली मोहल्ला, अजमेर रोड, मुनि सुव्रतनाथ मंदिर, मैन चौराहा, पुरानी मिल, सुमेर टॉकीज, सिटी रोड होते हुए पुन: चंद्रप्रभु मंदिर में विसर्जित हुई। शोभायात्रा में चांदी के कलात्मक रथ में श्रीजी को विराजित रथ को श्रद्वालु सारथी बन खीच रहे थे। रथयात्रा में सबसे आगे जैन समाज का पंचरंगा ध्वज थामे घुडसवार चल रहे थे। आचार्य धर्मसागर विद्यालय,के.डी.जैन पब्लिक स्कूल,प्रेसीडेंसी स्कूल गेगल के विद्यार्थी, चेलना जागृति महिला मंडल, चंद्रप्रभु महिला मंडल, अखिल भारतीय दिगंबर जैन महासभा, ज्ञानोदय नवयुवक मंडल के सदस्य भी नारे लगाते भजन गाते चल रहे थे। बैंड वादक व वीर संगीत मंडल भजनों की स्वर लहरियां  बिखेर रहे थे। हजारों जैन पुरूष धवल वस्त्रों में व मातृशक्ति केसरिया पोशाक धारण किए चल रही थी। शोभायात्रा का स्थान-स्थान पर पुष्पवृषा करके शीतल पेय, ठंडाई आदि से स्वागत किया गया। शोभायात्रा में आरके मार्बल के विमल पाटनी,अशोक पाटनी सहित हजारों जैन श्रद्धालु शोभायात्रा में आन-बान-शान के साथ चल रहे थे।

अजमेर । धर्म नगरी अजमेर में राष्ट्रसंत गौवत्स  राधाकृष्णजी महाराज की अमृतमयी वाणी में दिनांक 1 मई 2017 से 5 मई 2017 तक नानी बाई का मायरा एवं मीरा चरित्र की कथा का वृहद् आयोजन अजमेर के आजाद पार्क में किया जा रहा है। मुख्य यजमान शिवशंकर फतेहपुरिया एवं पवन फतेहपुरिया ने बताया कि कथा के लिये सुविधायुक्त पंडाल बनाया जा रहा है जिसमें महिलाओं एवं पुरुषों के बैठने की उत्तम व्यवस्था की जा रही है। उपरोक्त कथा में झरनेश्वर सेवा समिति द्वारा केवडे युक्त जल की व्यवस्था की जा रही है; समिति के हरीश एवं  राम फतेहपुरिया ने बताया कि प्रतिदिन ताजा फूलों से ठाकुर जी का नयनाभिराम श्रृंगार किया जायेगा। कथा प्रतिदिन दोपहर 3.30 बजे से सायं 7 बजे तक की जायेगी। वर्तमान मौसम को देख्तो हुए पंडाल में प्रतिदिन इत्र का छिडकाव किया जायेगा एवं प्रसाद वितरण किया जायेगा। कार्यक्रम को सफल बनाने हेतु तुलसी सेवा संस्थान, झरनेश्वर सेवा समिति,  राधाकृष्ण सखा परिवार, प्रभात फेरी परिवार सहित सभी धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाएं सहयोग कर रही हैं। इस हेतु शनिवार को बैठक आहूत की गई जिसमें उमेश गर्ग, ओमप्रकाश मंगल, किशनचंद बंसल, डा. विष्णु चैधरी, पवन मिश्रा, गोकुल अग्रवाल, दिनेश परनामी , विनीत कृष्ण पारीक, सुरेश शर्मा, शशिप्रकाश इन्दौरिया सहित सभी सदस्य मौजूद रहे।

नसीराबाद// परम श्रदेय प्रवर्तक पुज्य गुरूदेव 1008 श्री पन्नालाल जी महारासा एवं स्वाध्याय शिरोमणी आशु कवि मरूधर छवि आचार्य प्रवर पुज्य गुरूदेव 1008 श्री सोहनलाल जी महारासा की सुशिष्या शासन प्रभाविका पुज्या गुरूवर्या 1007 डा.श्री ज्ञानलता जी महारासा आदि ठाणा 5 के सानिध्य में महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव (महावीर जयंती) का प्रोग्राम दिनांक 09/04/2017 रविवार को नसीराबाद में श्री ओसवाल जैन सकल समाज द्वारा  तप, त्याग एवं तपस्या द्वारा नसीराबाद की पुण्य धरा पर कम्युनिटी हॉल, नसीराबाद में मनाया जायेगा !

वैरागी राजकुमार
जीवन के दुःख दर्द, अभावों और विभीषिकाओं से व्यथित मन में अगर उदासीनता का भाव उत्पन्न हो जाए या वयस के उत्तरार्ध में संसार की क्षणभंगुरता का, वास्तविकता का अनुभव होने पर वैराग्य की भावना ह्रदय में प्रस्फुटित हो जाए तो इसे सामान्य माना जा सकता है l किन्तु राजमहल के वैभव में पले किसी सुन्दर राजकुमार के मन में अगर ऐसे भाव उत्पन्न हो जाएँ तो उसे क्या कहेंगे ! जहाँ जरा-सी भूख महसूस होने पर छप्पन व्यन्जनों से सजी थालियाँ लेकर बीसियों दासियाँ तत्क्षण उपस्थित हो जाती हों, अथवा ज़रा-सा मन उदास होने पर स्वर्ग की अप्सराओं-सी निपुण और सुन्दर नर्तकियाँ सुर-साज़ के संग संगीत के एक अलग हीं संसार की संरचना कर देती हों ... इंद्रधनुष से दिन हों और फूलों जैसी रातें और फिर भी सुन्दर सुकुमार का मन इन सबमें न रमे तो इसे क्या कहा जाए ... ऐसा हीं कुछ हुआ था आज से करीब ढाई हजार साल पहले जब सोलह साल के सुन्दर राजकुमार वर्धमान ने अपने अंतर-उपवन में प्रज्ज्वलित वैराग्य-अग्नि को अनुभव कर मन हीं मन निवृति मार्ग का चयन कर अपनी माता त्रिशला से गृहत्याग की अनुमति माँगी थी l जाहिर है कि अनुमति तो नहीं मिली हाँ, पर माता का ह्रदय आशंकित ज़रूर हो उठा l पुत्र का मन सांसारिकता की ओर मोड़ने के लिए सुन्दर-सी राजकुमारी ढूँढकर उनका विवाह कर दिया गया l पर जिसके ह्रदय में वैराग्य ने डेरा डाल लिया, जिसे समूची संसृति की चेतनाओं को जगाना हो, उनके दुःख दर्द मिटाना हो उसके पाँवों को भला कौन रोक पाया है l माता के देहान्त के बाद 30 वर्ष की उम्र में अपने ज्येष्ठबंधु की आज्ञा लेकर इन्होंने राजमहल और संसार के समस्त सुखों को तिलांजलि देकर घर-बार छोड़ दिया और कठिन तपस्या करके 'कैवल्य ज्ञान' को प्राप्त किया । ये थे जैनधर्म के प्रवर्तक भगवान् वर्धमान महावीर जिनका जन्म ईसा से 599 वर्ष पूर्व चैत्र कृष्ण तेरस को वैशाली (बिहार) के गणतंत्र राज्य क्षत्रिय कुण्डलपुर में हुआ था । वह लम्बे कद, अत्यंत गौर वर्ण के दिव्य सुन्दर, तेजस्वी, साहसी और बलशाली राजकुमार थे l उन्होंने दुनिया को सत्य एवम अहिंसा का पाठ पढ़ाया और जैन-धर्म के पंचशील सिद्धांत बताए, जो है - अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य (अस्तेय) और ब्रह्मचर्य । सांसारिक अन्धकार की जड़ता का विनाश करने जब उनके पग बढ़ रहे थे तो एक-एक कर अपने शरीर पर पड़े मणियों और स्वर्णाभूषणों को मार्ग के भिखारियों को देते हुए वे आगे बढ़ते रहे l अन्त में उनके शरीर पर केवल एक उत्तरीय बचा रह गया जिसे उन्होंने कमर पर बाँध रखा था, तब एक भिखारी आया और उसने महावीर से दान की अपेक्षा व्यक्त की इस पर उन्होंने अपने शरीर पर पड़े उस एकमात्र वस्त्र का भी दान कर दिया और इस प्रकार राजघराना छोड़कर चीवर धारण करनेवाले उस सुन्दर राजकुमार ने जीवन में फ़िर कभी लँगोटी तक का परिग्रह नहीं रखा l 12 वर्ष और 6.5 महीने तक कठोर तप करने के बाद वैशाख शुक्ल दशमी को ऋजुबालुका नदी के किनारे 'साल वृक्ष' के नीचे महावीर को 'कैवल्य ज्ञान' की प्राप्ति हुई l भगवान् महावीर अहिंसा के साक्षात् प्रतिमूर्ति थे l उनके अनुसार न केवल सीधे-सीधे वध करना हीं हिंसा है, अपितु मन में किसी के प्रति बुरा विचार रखना भी हिंसा है । भगवान महावीर ने चतुर्विध संघ की स्थापना करने के साथ देश के भिन्न-भिन्न भागों में घूमकर अपना पवित्र संदेश फैलाया । त्याग, संयम, प्रेम, करुणा, शील और सदाचार ही उनके प्रवचनों का सार था । ईसापूर्व 527, 72 वर्ष की आयु में बिहार के पावापुरी (राजगीर) में कार्तिक कृष्ण अमावस्या (दीपावली) को महावीर ने निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया । उस समय निर्वाण स्थल पर अपने प्रिय शिष्य गौतम के अतिरिक्त उन्होंने किसी और को आने की अनुमति नहीं दी थी l एक अत्यंत विस्तृत और सुन्दर तालाब के बीचोंबीच उस निर्वाण स्थल पर वर्तमान में एक भव्य जलमन्दिर स्थापित है l यह विश्वविख्यात जल मंदिर बिहार के पावापुरी शहर में स्थित है । यह नगरी जैन संम्प्रदाय का सबसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है l कहा जाता है कि महावीर ने अपना प्रथम धर्म-प्रवचन यहीं पर किया था साथ हीं भगवान् महावीर स्वामी द्वारा जैन संघ की स्थापना भी पावापुरी में हीं की गई थी । विमान के आकर में बने इस भव्य मंदिर का निर्माण महावीर के बड़े भाई महाराजा नंदीवर्द्धन ने करवाया था । जल मंदिर में मुख्‍य पूज्‍यनीय वस्‍तु के रूप में भगवान महावीर की चरण पादुका अब भी रखी हुई है । यहाँ एक अखण्ड दीपक सदैव प्रज्जवलित रहता है । राजगृह (वर्तमान में राजगीर) से दस मील दूर महावीर के निर्वाण का सूचक एक स्तूप भी यहाँ खंडहर के रूप में उपस्थित है ।

कंचन पाठक
कवियित्री, लेखिका

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