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रिश्तों में प्रेम, भाईचारा और त्याग के बीजों को बोने की जरूरत, ताकि परिवार में आनंद की फसलें लहलहा सके : संतश्री ललितप्रभ सागर जी महाराज

हुबली 27 अप्रेल । राष्ट्र-संत श्री ललितप्रभ सागर जी महाराज ने कहा कि जिस घर में हम 23 घंटे रहते हैं वहाँ तो हो-हल्ला करते हैं और जिस मंदिर-स्थानक में केवल आधा-एक घंटा बिताते हैं वहाँ बड़े शांत रहते हैं। कितना अच्छा हो कि हम घर को ही अपना मंदिर मानना शुरू कर दें और धर्म की शुरुआत मंदिर-मस्जिद की बजाय घर से करना शुरू कर दे तो हमारे 24 के 24 घंटे धन्य हो जाएंगे। केवल हाथों में पुखराज, मोती या नीलम पहनने से कुछ न होगा। ग्रह-गोचरों की शांति तभी होगी जब व्यक्ति अपने घर में प्रेम की मुरलियाँ बजाएगा।


संतप्रवर हजारों श्रद्धालुओं से खचाखच भरे गोल्ड जिम हॉल में श्री आदिनाथ जिन मंदिर एवं दादावाड़ी ट्रस्ट द्वारा आयोजित सत्संगमाला के दौरान घर को कैसे स्वर्ग बनाएं विषय पर संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आजकल घरों में भाई-भाई, देराणी-जेठाणी, सास-बहू अलग-अलग कमरों में रहते हैं, वे आपस में बोलते नहीं, बतियाते नहीं, एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराते नहीं, सुख-दुख में काम आते नहीं ठीक वैसे ही जैसे कब्रिस्तान की कमरों में लोग रहते हैं। वे भी आपस में कोई व्यवहार नहीं करते, अगर दोनों की यही हालत है तो फिर घरों के कमरों में और कब्रिस्तान की कब्रों में फर्क ही कहाँ रह जाता है? उन्होंने कहा कि प्लीज, अपने घर के कमरों को कब्रें मत बनाइए। उन्होंने कहा कि पहले लोगों के पास मकान छोटे होते थे, पर दिल बड़े सो चार-चार भाई भी साथ रह लेते थे और आज व्यक्ति ने मकान तो बड़ा बना लिया, पर दिल छोटा कर लिया परिणाम अब दो भाई भी साथ रह नहीं पा रहे हैं। अगर दिल को छोटा रखेंगे तो हमारे परिवारों की हालत पानी सुख चुके तालाब की तरह हो जाएगी जहाँ दरारों के अलावा कुछ नहीं बचेगा।


घर में ही है स्वर्ग और नर्क-संतश्री ने कहा कि स्वर्ग किसी आसमान में और पाताल किसी नरक में नहीं होता। जिस घर में चार बेटे-बहुओं में माता-पिता की सेवा के लिए तरसते रहते हैं, अपने हाथों से रोटी चूरकर उन्हें खिलाते हैं वह घर का धरती का जीता-जागता स्वर्ग है। जिस घर में बूढ़े माँ-बाप को अपने हाथों से खाना बनाकर खाना पड़ता हो वह घर साक्षात नरक है। आजकल अमीर घरों में लोग माता-पिता की सेवा के लिए नौकर रखते हैं, लेकिन मैं उन्हें पूछना चाहूँगा कि जब पत्नी से प्यार करना होता है तो वे किन्हीं नौकरों को बुलाते हैं क्या? जब प्यार खुद करते हो तो सेवा औरों से क्यों?


सेवाभावी संस्थाओं के सदस्यों से संतश्री ने अपील की कि लॉयन्स क्लब या किसी रोटरी क्लब के सदस्य बनकर वृद्धाश्रम, अस्पताल या भिखारियों की सेवा करना आसान है, पर घर बैठे माँ-बाप की सेवा करना मुश्किल है। आपकी सेवा के पहले हकदार बाहर के नहीं घर के बूढ़े लोग है। सोचो, जिन पत्थर की मूर्तियों को हम बनाते हैं उनकी तो हम खूब पूजा करते हैं, पर जो माँ-बाप हमें बनाते हैं उनकी पूजा करने से हम क्यों कतराते हैं? याद रखें, बेटा वो नहीं होता जिसे माँ-बाप जन्म देते हैं, असली सपूत तो वो होता है जो बुढ़ापे में माँ-बाप की सेवा करता है। चुटकी लेते हुए संतश्री ने बहुओं से कहा कि आप सब कुछ पीहर से लेकर आईं, पर क्या पति को भी दहेज में पीहर से साथ लेकर आई थीं अगर नहीं तो जितने साल का पति आपको मिला है उतने साल तक सास-ससुर को निभाने का बड़प्पन अवश्य दिखा दिजिएगा। आज आपने उन्हें भाग्य भरोसे छोड़ रखा है सोचो, उन्होंने भी तुम्हे जन्म देते ही भाग्य भरोसे छोड़ दिया होता तो आज तुम किसी अनाथालय में पल रहे होते। जब हमने पहली साँस ली तो हमारे साथ माँ थी इसलिए हमारा यह दायित्व है कि जब उसकी अंतिम साँस निकले तो हम उसके पास हो।


रिश्तों में प्रेम और त्याग के बीज बोएं-संतश्री ने कहा कि अगर घर के लोग लकड़ी के गठ्ठर की तरह साथ-साथ रहंगे तो दुनिया की कोई भी ताकत उन्हें हिला नहीं पाएगी, पर वे लकडियों की तरह अलग-अलग हो गए तो पड़ोसी भी उन पर हावी हो जाएगा। आज रिश्तों में प्रेम, भाईचारा और त्याग के बीजों को बोने की जरूरत है ताकि परिवार में आनंद की फसलें लहलहा सके। चुटकी लेते हुए संतश्री ने कहा कि आजकल सास-बहू में न बनने के कारण बेटे माँ-बाप को गाँवों में रखने लगे हैं। घर में माँ का कहीं अतापता नहीं और लोग घर का नाम मातृछाया रखते हैं। वे लोग नाम बदलकर पत्नीछाया रख दे। जिस घर पर पत्नी के अलावा किसी की छाया नहीं पड़ती उस घर का नाम मातृछाया रखने का क्या मतलब?हम सब साथ-साथ है का नारा अपनाने की सीख देते हुए भाई-भाई के साथ का जो सुख है वह तो स्वर्गलोक में भी नहीं है। अगर एक तरफ मंदिर की प्रतिष्ठा में 5 लाख का चढ़ावा बोलना हो और दूसरी तरफ कमजोर भाई को व्यापार के लिए 5 लाख का सहयोग करना हो तो पहले भाई की सहायता कीजिएगा क्योंकि ऊपरवाला चढ़ावे से नहीं भाई का सहयोग करने से खुश होगा। समाज को जोड़ने वाला सच्चा संत-संतश्री ने कहा कि जो समाज को जोड़े वही सच्चा संत है। तोडने वाला कभी सच्चा संत नहीं हो सकता। हम समाज में ऐसे संतों को बार-बार बुलाए जो एकता में विश्वास रखते हो। हम समाज को नारंगी की बजाय खरबूजा बनाएं जो बाहर से भले ही अलग दिखाई देता है, पर छिलके उतरते ही एक हो जाता है। उन्होंने कहा कि हुबली में जो धार्मिक समरसता का जो माहौल बना है, उसे देखकर हम अभिभूत हैं। भगवान करे इसे कभी नजर न लगे।


घर को स्वर्ग बनाए का भजन सुनाया- जब संतप्रवर ने आओ, कुछ ऐसे काम करें जो घर को स्वर्ग बनाएं, हमसे जो टूट गए रिश्ते हम उनमें साँध लगाएं, हम अपना फर्ज निभाएं भजन सुनाया तो सत्संगप्रेमियों का हृदय भीग उठा। प्रवचन से प्रेरित होकर हजारों युवाओं ने प्रतिदिन माता-पिता को प्रतिदिन पंचांग प्रणाम करने का संकल्प लिया। इससे पूर्व कार्यक्रम की शुरुआत मुनि शांतिप्रिय सागर महाराज ने सामूहिक प्रार्थना से करवाई। इस अवसर पर लाभार्थी रमे बाफना, दादावाड़ी के प्रकाश छाजेड़, दिनेश संघवी, रतिलाल भाई जैन, सम्पतराज कटारिया, कोटूर संघ अध्यक्ष बाबूलाल जी बाफना, रामकृष्ण जी पालेकर, पारसमल जी मांडोत, बाबुलाल जी मुणोत गोल्ड जिम परिवार, पूना के गुरुभक्त विशाल लोढ़ा एवं श्रीपाल छाजेड़ और बागलकोट संघ के सदस्यों ने दीप प्रज्वलित किया।