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आध्यात्मिक साधना की नौ रातें

 

जड़-चेतन सबमें मौजूद शिवशक्ति-तत्व कालातीत है ... देश, काल से ऊपर है । शक्ति के बिना शिव भी शव हैं, जड़ हैं । वेद में कहा गया है मातृशक्ति दिव्यलोक से पितरों द्वारा प्रेरित हो इस मर्त्यलोक के कर्मक्षेत्र में जीवनयज्ञ चलाने आती है । मातृशक्ति ... मातृत्वभाव ... जननी ... शाश्वत-शक्ति ... स्त्री ... । सृष्टि का सृजन, पालन एवं संहार करने वाली उसी सर्वशक्तिमना की उपासना के लिए हमारे यहाँ साल में दो नवरात्रियों को अति प्रशस्त माना गया है । ये दोनों नवरात्र क्रमशः चैत्र, और अश्विन मास में मनाए जाते हैं । आद्याशक्तिनी की उपासना का यह पर्व शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथिओं, नौ नक्षत्रों, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के संग सनातन काल से हीं मनाया जाता है । इन दोनों नवरात्रियों के अलावा दो और गुप्त नवरात्र भी होता है जिसके बारे में बहुत हीं कम लोगों को जानकारी है यह नवरात्र क्रमशः पौष एवं आषाढ़ मास में पड़ता है । नवरात्रि में महाशक्ति उपासना की जाती है । तंत्रागम के अनुसार शक्ति की महिमा "दुर्गम" है इसीलिए उन्हें "दुर्गा" कहते हैं । हम सब जानते हैं कि जहाँ समस्त देवतागण आततायी राक्षसों के समक्ष बलहीन तथा उर्जाहीन हो गए थे वहीँ शक्ति ने साक्षात दुर्गभीमा का रूप धरकर आसानी से सभी आततायियों का संहार कर दिया था । शक्ति हमारे भीतर है, बाहर है, आसपास है, सर्वत्र है । यह तो महसूस करने की चीज है, हम सबके अन्दर जो शक्ति है किसकी है ? यह उसी आदिशक्ति की छाया है । द्वेष, अज्ञान, झूठ, प्रपंच, जड़ता ... ये सब नकारात्मक चीज़ें शक्तिनी महाकालिका के रौद्र रूप के समक्ष भस्म हो जाती हैं । यह शुद्ध शाश्वत अनुभूति है । हमारे यहाँ सदियों से नवरात्रि में आद्याशक्ति भवानी का अनुष्ठान, साधना एवं उपासना का पावन पर्व मनाया जाता रहा है । किन्तु देखा जाय तो बदलती सामाजिक - सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार नवरात्रि में शक्ति-पूजा के रूप-स्वरुप में अब काफी परिवर्तन आ गया है । अब यह आतंरिक शुद्धिकरण की बजाय व्यर्थ आडम्बर एवं दिखावे की पूजा ज्यादा हो गई है । लाउडस्पीकर पर शोर गुल फैलाने से कुछ नहीं होगा वैसे भी जब उपासना के नाम के संग हीं ''रात्रि'' ( नव+रात्रि ) शब्द जुड़ा हुआ है तो इसका अर्थ बेहद गहन हो जाता है यह केवल दिन के समय किया जाने वाला कर्म कांड नहीं बल्कि रात्रि के समय की जाने वाली गुप्त आन्तरिक साधना का नाम है । उच्च आध्यात्मिक शक्तियों को जगाने के लिए सच्चे साधक सारी-सारी रात बीज-मन्त्रों अथवा त्राटक का आन्तरिक अभ्यास करते हैं यौगिक शक्ति की प्राप्ति के लिए इन विशेष मुहूर्तवाली रात्रिओं में की जानेवाली साधना सदियों से फलदायी मानी जाती रही है । हाँ, पर साधना मन की होनी चाहिए आडम्बरों की नहीं । साधना में सच्चाई होनी चाहिए तभी वह फलित होती है । मिट्टी की प्रतिमा बनाकर नौ दिनों तक आडम्बर करने से कुछ नहीं होगा जब तक कि भावनाओं में सत्यता नहीं होगी । एक नारी की कोमलता को अक्षमता समझना, मार्दव को मज़बूरी मानना, बलाघात का अस्त्र चलाकर उसके स्त्रीत्व का अपमान करना, जन्मदात्री की भ्रूणहत्या का महापाप करना अथवा कुल कुटुंब की दुहाई देकर जीवनपर्यन्त उसका शोषण करना अगर आपको कहीं से भी अनुचित नहीं लगता, एक स्त्री में अगर आपको मातृशक्ति नहीं दिखती, एक बालिका में अगर आपको पुत्रीवत छवि दृष्टिगोचर नहीं होती तो मैं समझती हूँ कि आपकी नौ दिनों की साधना बेकार है, व्रत फलाहार सब ढोंग है । मैं पूछती हूँ कि जब आपके अन्दर भावना की दृष्टि हीं अनुपस्थित है तो नौ दिनों तक पूजा पाठ, व्रत उपवास, ब्रह्मचर्यं, दान-दक्षिणा का क्या अर्थ निकलता है ... केवल शून्य हीं न ?

- कंचन पाठक.
साहित्यकार, स्तम्भकार