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डॉ मधु त्रिवेदी की कविता "भवसागर"

25 मार्च 2017
Author :  

बनाकर नाव कागज की
भवसागर पार कर चले
प्रभु नाम की पोथी लेकर
जीवन को तार कर चले
बहुत ही मनाया राम को
पर गति पा न सका मैं
इसी जीवन में हर जीवन
की बाजी हार कर चले

बना माटी खिलौना हर
जन मनचाह खेलता रहा
मन को बहला उछाल -
उछाल कर फेंकता रहा
यह जग माया बन कर हर
रोज सबको ही ठगता
भरने के बाबजूद पेट को
नोट हर पल ऐठता रहा

डॉ मधु त्रिवेदी 
आगरा (उत्तर प्रदेश)

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