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यहां मंदिर के सेवादार मुसलमान, मजार पर सजदा करते हिंदू

28 सितम्बर 2017
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बेगूसराय । ईश्वर की पूजा धर्म और संप्रदाय में बंधी नहीं होती। जहां एक ओर जाति और धर्म को लेकर विद्वेष की भावना से प्रभावित होकर हम इंसानियत को भूल रहे हैं, वहीं बिहार के बेगूसराय में दुर्गा पूजा के दौरान उठकर सांप्रदायिक भावना और आपसी सहयोग का एेसा अनूठा मिसाल देखने को मिल रहा है जो देश और दुनिया के लिए नजीर है।

शहर के कर्पूरी स्थान में स्थित 97 साल पुराने करोड़ीमल गजानंद माता दुर्गा मंदिर में सांप्रदायिक सौहार्द्र की अद्भुत मिसाल देखने को मिल रही है। मंदिर की व्यवस्था हिन्दुओं से ज्यादा मुस्लिमों के हवाले है। दुर्गा पूजा समिति के अध्यक्ष अशोक कुमार गोयनका ने बताया कि मंदिर कमेटी के कुल 24 सदस्यों में 17 मुस्लिम सदस्य नवरात्र से पूर्व पूजा-अर्चना और मेला के प्रबंध में लगे हैं।

शहर के सबसे प्रसिद्व मंदिरों में गिने जाने वाले दुर्गा मंदिर में रोजाना हजारों भक्त पूजा-अर्चना करने आते हैं। मंदिर से सिर्फ पचास मीटर की दूरी पर पीर की मजार है जिस पर सभी अपना सिर झुकाए बगैर आगे नहीं बढ़ते। दुर्गा पूजा हो या अन्य कोई त्योहार बगल के करोड़ीमल गजानंद माता दुर्गा मंदिर में मुस्लिम समुदाय के लोग पूरी अकीदत के साथ पूजा-अर्चना में हिन्दू भाइयों का साथ देते हैं।

मंदिर समिति के कार्यकर्ता मो. कैसर आलम का मानना है कि पर्व कोई भी हो, हमलोग एक साथ मिलकर मनाते हैं। जिस तरह दुर्गा पूजा में हमलोग पूरी तैयारी मिलकर कर रहे हैं। उसी तरह मुहर्रम की तैयारी में हिन्दू हमारे साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे हैं। वे बताते हैं कि 1921 में स्थापित इस दुर्गा मंदिर के प्रति लोगों की अपार श्रद्धा है।

मंदिर की खासियत यह है कि व्यवस्था में सभी धर्मों के लोगों का सहयोग होता है। सुबह होते ही सफाई की पूरी जवाबदेही मुसलमान तबके के लोग उठाते हैं। इस इलाके में जाति-धर्म की दीवार नहीं है। हर धर्म के लोग एक दूसरे के पर्व को मिलजुल कर मनाते हैं। मंदिर कमेटी के पदाधिकारी मुन्ना गोयनका के मुताबिक यहां इतनी भाईचारगी है कि हम हमेशा से एकता के साथ पर्व मानते आ रहे हैं।

धर्म सिर्फ इबादत के लिए है नफरत फैलाने के लिए नहीं। यह मानना है मंदिर कमेटी के कार्यकर्ता मो. कैसर, मो. अनवर, मो. अकबर खान का। कहते हैं कि दुर्गा पूजा पर मंदिर परिसर में लगने वाले मेला की पूरी व्यवस्था हम लोग मिलकर करते हैं।

मुहर्रम और दुर्गा पूजा में कोई फर्क नहीं समझने वाले यहां के लोग एक दूसरे का प्रसाद खाने और बांटने का काम भी पूरी ईमानदारी से करते हैं। पिछले 15 सालों से वे सभी मंदिर के कार्यकर्ता हैं। 20 वर्षों से इस मंदिर में कार्यकर्ता मो. असलम का कहना है कि वे यहां प्रसाद बांटते हैं।

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