-->

संक्रान्ति का उल्लास
Featured

14 जनवरी 2017
Author :  

बन पतंग की डोरी
खींची चली आऊँगी
लाल हरी नीली पीली
पतंगों के बीच गगन
में उड़ खूब इतराऊँगी

पतंग की डोर सी
प्रीत मेरी है पिया
जो दूर आसमां में
मुझे तुझसे मिलाएगी

देख हरी पतंग मुझे
आज मुस्कराई है
छोड़ के जमीं को
आसमा में छाई है

मैं भी उड़ती रही
पीछे -पीछे हरी के
आखिर मुझे आना है
बन के उसकी छाया

डॉ मधु त्रिवेदी
सर्वाधिकार सुरक्षित

637 Views
palpal