साहित्य (39)

साहित्य

जयपुर // प्रख्यात कवि एवं लेखक कर्नल अमरदीप की चर्चित दो पुस्तकें ‘मेरी उम्र की महिलाएँ’ (काव्य संग्रह) और ‘मुसाफ़िरनामा’ (अपने समय का लेखा) का लोकार्पण, जयपुर के सुदर्शनपुरा स्थित बोधि प्रकाशन सभागार में प्रवीण नाहटा की अध्यक्षता, कवियित्री और चित्रकार सुश्री अंजना टंडन एवं अजीतगढ़ के आशीष शर्मा खाण्डल के मुख्य आतिथ्य द्वारा भव्य गरिमामय आयोजन में सम्पन्न हुआ। इस आयोजन में जयपुर के नामचीन रचनाकार, कवि, सैनिक परिवारों के सदस्य व साहित्य प्रेमी इस आयोजन के साक्षी बने । कर्नल अमरदीप की यह पुस्तके बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित हुई हैं 

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‘मेरी उम्र की महिलाएं’ लेखक का चौथा कविता संग्रह है और ‘मुसाफिरनामा’ इसी नाम से लिखे जा रहे समसामयिक विषयों के स्तम्भ का संकलन है कर्नल अमरदीप की इस पुस्तक में यह मालूम पड़ता है यदि व्यवस्था में लय हो तो बहुत सारी समस्याएं हल हो सकती हैं। मगर इस लय को लाने के लिए बहुत त्याग, बलिदान करना होता है।

सामाजिक और राजनैतिक सरोकारों को साहित्य से जोड़कर समाज में चेतना लाने के लिए सक्रिय कर्नल अमरदीप की यह पुस्तक पाठको को बहुत रोचक लगेगी पुस्तक का आकर्षक चित्रांकन, कार्टून और रेखाचित्र जन टीवी के कार्टूनिस्ट कमल किशोर ने किया है।

इस अवसर पर दोनों पुस्तकों के किन्डल संस्करण का भी लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम का शानदार संचालन लेखिका और कवयित्री शिवानी शर्मा ने किया एवं अंत मे बोधि प्रकाशन के कवि एवं प्रकाशक मायामृग ने सभी अतिथियों, कार्यक्रम में उपस्थित सभी आगुन्तको का आभार प्रकट किया.

 

 

जयपुर//आज जयपुर स्थित प्रेस क्लब के मुख्य सभागार में आयोजित एक भव्य समारोह में अखिल भारतीय डॉ कुमुद टिक्कू कहानी प्रतियोगिता में जयपुर की शिवानी शर्मा को श्रेष्ठ कहानी के सम्मानित किया गया। 
 
इस अवसर पर साहित्य जगत की नामचीन हस्तियां ममता कालिया, चंद्रकांता, प्रोफेसर पवन सुराणा, डॉ सुदेश बत्रा, नीलिमा टिक्कू, देवर्षि कलानाथ शास्त्री, नंद भारद्वाज एवं दुर्गा प्रसाद अग्रवाल की गरिमामई उपस्थिति रही ।
 
उपस्थित अतिथियों ने शिवानी शर्मा को पुष्पाहार एवं शाल पहना कर, प्रशस्ति पत्र एवं दो हज़ार रुपए की राशि पुरस्कार स्वरुप प्रदान कर सम्मानित किया गया ।
 
 
प्रसिद्ध साहित्यकार नीलिमा टिक्कू अपनी सासु मां की स्मृति में प्रति वर्ष साहित्य की किसी एक विधा पर ये प्रतियोगिता आयोजित करती हैं। स्पंदन संस्था के माध्यम से नीलिमा ने साहित्य सेवा और साहित्यकारों को पुरस्कृत एवं सम्मानित करने का जो बीड़ा उठाया है वो अतुलनीय है समस्त साहित्य जगत नीलिमा टिक्कू की इस  साधना को नमन करते हुए इस प्रोत्साहन के लिए आभार प्रकट करता हैं।
 
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हस कर बोली वह
अजी रहने दो यह रोज रोज की
दिल टूटने की बातें
देख चुकी हूं मैं......
सोनोग्राफी में तुम्हारा साबुत दिल
जोर जोर से
उछलता हुआ।

दिल पर दरारें पड़ गई
तुम्हारे व्यगं बाणों से
यकीन न हो तो देख लो
यह लाल पीली रेखाएं
ई.सी.जी. की

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सोचे बैठे थे
कब का टुकडे टुकड़े हो गया
हैरत हुई स्क्रीन पर
दिल को साबुत देख कर।

शशि पाठक
बरकतनगर जयपुर

बच्चों को स्कूल छोड़ कर सुमित्रा जल्दी से वर्मा आटीं के घर पहुंची !
क्या बनाऊं आटीं जी?
चने की दाल और आलू मेथी बना लो !
उस ने देखा मेथी की गुच्छी किचन में पड़ी थी ! वह दाल चढा कर उसे साफ करने लगी ! मन में तो आया कहे----आटीं जी, हरी सब्जी तो आप साफकर के रख दिया करो बहुत टाईम लग जाता है पर पता था अगर कह दिया तो जवाब मिले गा-----तो फिर बना भी मैं ही लिया करुगी ! टाईम लगता है तो पैसे किस बात के लेती हो? इस लिए वह चुपचाप मेथी साफ करती रही !
यहां से निकल कर गुप्ता आटीं के पहुचना है ! वहां ज्यादा काम नहीं है ! दो बुजुर्ग लोग हैं, जो बना दो चुपचाप खा लेते हैं ! पर परेशानी तो माथुर आटीं के होती है,, दाल चावल रोटी सब्जी रायता सब बनता है ! कहने को तो तीन ही लोग हैं पर पसंद सब की अलग अलग है ! साहब को लौकी पसंद है तो मेमसॉब को मटर और छोटे साहब यह दोनो ही नहीं खाते , उन के लिए गोभी बनाई !
बाई ,भैया के लिए थाली लगा दो !
थाली लगा कर उस ने टेबल पर रखी दाल चावल गोभी रोटी रायता और सलाद
छोटे साहब ने एक कौर मुह में डाला और थाली सरका दी-----कितना बेकार खाना है !मुझे नही खाना !
अरे, बाई जरा ध्यान से बनाया करो ! ले जाओ थाली और बेटे को मैगी बना दो !
इस थाली का क्या करू आटीं ? डस्टबिन में डाल दो और क्या करोगी !

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बड़े दुखी दिल से उस ने थाली डस्टबिन में उल्टी और मैगी बनाने लगी !
यहां से निकल कर वह जल्दी जल्दी कदम बढाती हुई अपने घर पहुंची ! बच्चे दरवाजे पर ही मिल गये ------
मम्मी ,कितनी देर कर देती हो ! भूख लगी है जल्दी खाना दो !
बस अभी लो---और वह जल्दी जल्दी सिल बट्टे पर चटनी पीसने लगी ! छोटा बेटा ठुनक कर बोला----रोज रोज चटनी रोटी दे देती हो ! कभी सब्जी भी तो बनाया करो !
हां कल जरूर बना दूंगी बेटा ,आज देर हो रही है ना ! उस की आखों के सामने डस्टबिन में उल्टी परसी हुई थाली कौंध गई ! तीन घरों में खाना बना कर वह मुश्किल से कमरे का किराया और बच्चौ की फीस दे पाती हैै ,सब्जी के लिये पैसे ही नहीं बचते यह बात वह अपने मासूम बच्चों को कैसे समझाये ! उस की आखों के सामने फिर परसी थाली घूम गई जो उस ने डस्टबिन में उल्टी थी और आखं से आंसू टपक गया जिसे उस ने बच्चों से छिपा कर पोंछ लिया !

शशि पाठक
बरकतनगर जयपुर

  • जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    पलकों का ख्वाब बनकर
    नील गगन तले
    पंख पसारे उड़ने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    कान्हा की बांसुरी का
    मनमोहक मादक स्वर बन
    सृष्टि के कण-कण में
    मुझको भी रचने बसने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    विहंग कलरव से
    गुंजित उपवन की
    मनमोहक आभा बन
    मुझको भी झलकने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    सिंधु के निर्मल नीर की
    धारा का प्रवाह बन
    मुझको भी प्रवाहित होने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    वैध्वय की पीड़ा का सोलह श्रृंगार बन
    दुल्हन सा सतरंगी चुनरिया का
    ताना-बाना बुनने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    पर्वतराज हिमालय के
    शिखर के ताज का गुमान बन
    मुझको भी चमकने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।
    मां के वात्सल्य के अंक में
    स्पर्श के सुख से
    मुझको भी आह्लादित होने दो ।
    जग मुझको ही रमने दो
    मनुष्य के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    मां बाप के नयनों की ज्योति बन
    जीवन पथ पर
    कदम से कदम मिलाकर
    मुझको भी चलने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    स्वयं को मानसिक
    रूठिवादिता से मुक्त कर
    स्वच्छंता का माहौल
    भारत में भी पनपने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    बेटियां होती है बेटों से कम नहीं
    अब सहेंगे कोई जुर्म नहीं
    भारत का गौरव बन
    हमको भी जीने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।

    उर्मिला.के.मोसलपुरी
    पाली- मारवाड़  

 

आज न दिखती कहीं
परिवार की एकता -----
जो थी शान ,
और पहचान ,
जो थी अवलम्बित स्वहित के त्याग पर
आज मानव त्याग भूल खुद के सुख को ढूँढ रहा ----
धीरज खो देता पल भर में , नहीं चाहता सुनना किसी को --
सभी अपनी सुनाने में लगे हैं , जिससे परिवार बिघटित हो रहे ,,,
पीढ़ी का अंतर , बना रहा संबंधों में तकरार ----
खत्म हो रहे आपस के प्यार ---

 

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बाबा दादी का न चाहिए अब किसी को दुलार,,
और न vvvही परिवार के प्रेम की बौछार ---
आज सब व्यस्त हैं , खुद में ही मस्त हैं ,,
दूर रहना चाहते रोका टोकी से -----
इसलिए बनाते आशियानें इतनी दूर ,,
रहते खुद में ही मशरूफ ---
दिन पर दिन है परिवार टूटता ---
एक बार टूटना शुरू होने पर फिर न जुटता ---
आज की है समस्या बड़ी विकट ,
कोई न रखना चाहे किसी को निकट ---
एक दिन फिर ऐसा भी )आएगा
परिवार के नाम का बस अवशेष रह जाएगा -----
हम इतिहास में ही पढ़ पायेंगे ---
और किताबों से ही बड़े परिवार
की अवधारणा का पता लगा पाएँगे ---

सीमा "मधुरिमा"
लखनऊ (उत्तर प्रदेश )

हे याज्ञसेनी, हे अग्निगर्भा, तुम एक विल-क्षण नारी थी

पर इतिहासों के पृष्टो पर, बस ताड़ना की अधिकारी थी

 

ना  जन्म लिया  देखा बचपन, ना  देखा नन्हा सा क्रंदन

 अद्भुत  यज्ञ  था शुचि अनल ,युवति बन तुमने लिया जन्म

 

फिर लक्ष्य प्राप्ति हेतु तुमने, था किया  खुद को आहुति सखी

क्या मन में  उपजी नहीं व्यथा, क्या क्षोभ जरा भी नहीं हुआ

 

जिसको था प्रेम किया  मन से,ना  उसको पाया पूर्ण रूप

कैसे तुमने सह ली पीड़ा ,क्या है रहस्य तुम क्यों अनूप

 

हे सखी तुम स्वयं नारी  हो, तुम मेरे  मन को जानोगी 

एक बात मैं कहती हूँ तुमसे, तुम निश्चित उसको मानेगी

 

अग्नि की गोद से जन्मी मैं, एक लक्ष्य पिता का साथ लिए

मैं याज्ञसेनी आयी जग में , दायित्वों का संताप लिए

 

विदूषी थी जाना था मैंने, किस कारण जग में  आई थी

लज्जित कर दे जो कल्पना को  ,वो रूप शिखा भी पायी थी

 

पर थी नारी  ही मैं भी तो, इस मन पे मेरा कहा बल था

जो दिखा सदा ही इस जग को, माया थी वो बस एक छल  था

था पंच-पति को वरन किया , मैं कहलाती हूँ पांचाली

पीड़ा  से फिर भी कभी कभी, पाती थी खुद को बस खाली

 

एक समर हुआ कुरुभूमि में , सौ समर थे मैंने खुद से लडे

हर समर में  मैं जय हो पायी ,थे सखा रूप मैं कृष्णा खड़े।

 

सौभाग्य मेरा दुर्भाग्य बना, वो बाजी थी एक चौसर की

दुर्योधन मन तो प्रतीक्षित था ,कई समय से ऐसे अवसर की

 

जो पंच पति परमेश्वर थे ,जो योद्धा थे प्रलयंकारी

वो झुका के मस्तक बैठे थे, स्तब्ध थी कुरुसभा सारी

 

वो पार्थ कि  जिनके बाणो में , साक्षात् यम की दावाग्नि थी

निर्वीर्य बने वो बैठे थे, लज्जित होती अर्धांगनी थी

 

उस कुरुसभा मैं खड़ी थी मैं, कुलवधू थी मैं उस कुरुकुल की

सारे मेरे थे स्वजन  वहां ,फिर भी भय से मैं आकुल थी

 

हो दग्ध वासना से खुद की ,दुर्योधन मन उन्मादित था

मेरी इस क्षीण दशा को देख, हर दुष्ट हृदय आह्लादित था

 

जब दुशासन के हाथ बढ़े , हरने को मेरा चीर  सखी

वह रोष ,क्रोध, अपमान, व्यथा ,थी चरम परिध पे पीर सखी

 

जग से हारी ,प्रेम से हारी ,पर भावना  को संवरण किया 

उन अश्रुसिक्त नैनो को भींच, मैंने माधव का स्मरण किया 

 

ये अभ्यंकर हे दया निधि, आओ मन मैं आहवान किया 

उस श्याम सलोनी मूरत का ,अश्रुजल से आचमन किया 

 

उसके आगे की गाथा का है, बस इतना ही सार सखी

परमेश्वर गर है साथ तेरे ,निश्चित है तम की हार सखी

 

पर छिन्न भिन्न था हृदय मेरा, इतने थे मन मैं शूल गड़े

हर समर मैं मैं जय हो पायी, थे सखा रूप मैं कृष्णा खड़े

 

जब जब दुविधा मैं मन था मेरा ,या दम्भी कुछ आचरण था मेरा

के-शव को सम्मुख पाती थी, हर वेदना बस टल  जाती थी

 

वो पार्थ सारथि थे रण में ,और निश्चित विजय कराई थी

मैंने जीवन की  सीख सभी, फिर  योगेश्वर   से पायी थी

 

जो राधा के प्रियतम थे सांवरे ,सौभाग्य रुक्मणि पायी थी

 मैं मन से कृष्ण को अर्पण थी, और कृष्णा मैं कहलायी थी

 

 वो अचल अजेय वो आदि देव, वो थे मेरे संग मैं सदैव

मेरे नीर में  थे, मेरी पीर में थे , मेरे केशो में,  मेरे चीर में  थे

 

जब जब जग ने अपमान किया , मेरे सखा ने मुझ को थाम लिया

मेरे नयनो के हर इक अश्रु को, मोहन ने खुद का मान लिया

 

वो माधव जो अपने मुख मैं त्रैलोक्य समाया करते थे

वो सहचर बन संग थे मेरे ,रूठू  तो मनाया करते थे

 

वो मुरली धर जिनकी धुन सुन, सुध बुध गोपिया खोती थी

वो मेरे पथ के प्रदर्शक थे ,निशदिन गोष्ठिया होती थी

 

वो मार्ग भी थे ,वो लक्ष्य भी थे, वो लक्ष्य प्राप्ति का साधन भी

वो पूजा भी, परमेश्वर भी ,वो नर भी ,वो नारायन  भी

 

मेरे क्रोध में  थे, मेरे बोध में  थे, मेरी दुविधा में ,आमोद में  थे

हर शोध का वो परिणाम भी थे ,और हर परिणाम के शोध में  थे

 

मेरे हर प्रण में , जीवन रण में , कृष्णा के साथ थे कृष्ण लडे

हर समर में  मैं जय हो पायी, थे सखा रूप मैं कृष्णा खड़े

 

लेखिका
श्रीमती शिखा जे पचौली
सहायक प्रोफेसर , कंप्यूटर इंजीनियरिंग विभाग
एआईएसएसएमएस कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग
पुणे (महाराष्ट्र )

ज़मीं के जिस क्षितिज पर जज्बाती ख्वाहिशों का मंजर मिला करता था।।

अरसो बात आज हमारा कारवां उसी सोंन्धी मिट्टी की महक से होकर गुजरा जा रहा था।

अकस्मात देखा तो जिगर सूई धागे की तरह तेरी और खींचा चला आ रहा था।।

ख्वाबों के इसी ताने बाने के अधेडबुन में विगत स्मृति के पलों से रूबरू होने लगी।।

तेरे संग बिताए लम्हों से प्रीत के एहसास के सुमधुर जाल बुनने लगी।।

नयनों में धूमिल स्मृतियां उद्वेलित जहन में वर्तमान बन छा गई।।

एक अनजान सफर के हमराही बनकर पुनः मैं तुमसे मिलने आ गई।।

तलब जब होती हैं शमा को परवाने की जहन का सुकून काफूर हो उठता है।।

स्वप्निल एहसास इस धरातल पर हकीकत बनने पर परम तत्व तुमसे आ जुड़ता है।।

ईद-गिर्द मेरे शबनम की कशिश बन नयनों में तू तृष्णा बन समा गया।।

हे प्रिय ! आज तुमसे मिलने को दिल पंछी बन तुम्हारे पास आखिर आ गया।।

यौवन की वो अंगड़ाइयां लबों की मादकता का हो दिलकश मद।।

अठखेलियां करता था जब तू मेरे संग हो जाती थी हद ।।

हाथों से फिसलती मिट्टी की तरह वह स्वप्न कहीं फिसल गए।।

मेरी परछाई बन जिस्म की रग-रग में लहू का कतरा कतरा बन जम गए।।

पहरेदारों का पहरा ना रोक सका विगत क्षणों की क्षणिक स्मृतियां।।

अतीत के लम्हों की परछाइयों को कैद करने में असमर्थ हो गई कवित्रियां।।

उर्मिला फुलवारिया
पाली-मारवाड़

जयपुर // अजमेर पोएट्स कलेक्टिव, जयपुर द्वारा मासिक गोष्ठी, बोधि प्रकाशन, सी-46 (बेसमेंट), सुदर्शनपुरा, चित्रगुप्त नगर-ii, सुदर्शनपुरा, बाइस गोदाम, जयपुर के सभागार में अजमेर पोएट्स कलेक्टिव की मासिक गोष्ठी कार्यक्रमों की श्रंखला में एक और यादगार आयोजन के रूप में दर्ज़ हो गयी।

कार्यक्रम का शुभारम्भ संजोयक शिवानी शर्मा द्वारा माँ शारदे के समक्ष मंचासीन अतिथियों एवं विभिन्न कवियत्रीओ द्वारा सुरीले कंठ से खूबसूरत गीत प्रस्तुत कर माँ शारदे की वंदना से की गयी । तत्पश्चात अतिथि परिचय एवं स्वागत की परम्परा के निर्वाह के लिए शिवानी शर्मा ने अपनी काव्यात्मक शैली में सभी मंचासीन अतिथियों परिचय करवाया ।

अजमेर पोएट्स कलेक्टिव टीम द्वारा सभी मंचासीन अतिथियों का सम्मान किया गया । काव्य संगोष्ठी के क्रम में जहाँ रचनाकारों ने प्रेम, विरह, हास्य के रंगों से जज़्बातों के कैनवास रंगीन कर दिये। नारी प्रधान रचनाएं थीं तो सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दे भी रचनाकारों ने अपने अल्फ़ाज़ों से उठाए।

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आज के कार्यक्रम में मुख्यता माया सर ने कहा कि "आज मेरा मन है कुछ अपने दिल की बात कही जाए" और फिर उन्होंने 'चुप्पे शख़्स की डायरी' के कुछ पन्ने इस तरह भावुक हो कर पढ़े कि सभी उनके साथ भावनाओं में बह गए । सभागार में सन्नाटा छा गया । पता नहीं कहां किस दुनिया में ले जाते हैं माया सर ।

भावनाओं के समंदर हैं जहां, उम्मीद का सूरज भी है । मुस्कुराहट बिखेरती असीम वेदना भी होती है वहां, जिनमें खोकर हम सब ताली बजाना भी भूल जाते हैं । उन्हें पढ़ कर समझना जितना मुश्किल होता है उतना ही आसान है उन्हें सुनकर महसूस करना । उन्हें सुनना अद्भुत अनुभव रहा । महेश कुमार का बाल गीत "ओ री चिड़िया क्या गा रई यै?" बहुत ही शानदार था । आज इस कठिन दौर में जब बचपन इलैक्ट्रोनिक गैजेट्स में खो रहा है, उनका गीत बच्चों की ज़ुबान पर तुरंत चढ़ जाने वाला है ।

कर्नल अमरदीप सिंह ने प्रेम से अलग कुछ बेहतरीन कविताएं सुनाई, उनकी एक बहुत बचपन में लिखी कविता 'दरार' ने बहुत प्रभावित किया जिसमें बचपन की दोस्ती अचानक ही धार्मिक उन्माद की भेंट चढ़ जाती है।आज की मासिक गोष्ठी में दो युवा कवि तनेश शिव जिंदल और रविंद्र पारीक ने बहुत कम उम्र में ही स्तरीय लेखन से श्रोताओ को प्रभावित किया।

शैलेश सोनी ने अपने सुपरिचित अंदाज़ में मधुरता बिखेरी । अरुण धर्मावत तो हमेशा से ही प्रभावित करते हैं। नूतन गुप्ता ने अपनी नई ग़ज़ल के खूबसूरत शेर से दिल जीत लिया एवं शशि पाठक का उम्र के इस पायदान पर उनका ऑब्जरवेशन और उसको कविता में कहना विस्मृत कर देता है ।

विनीता किरण और निरुपमा चतुर्वेदी ने अपने मधुर कंठ से खूबसूरत ग़ज़ल और गीत की रसधारा में सबको भिगो दिया। चित्रा भारद्धाज ने शानदार ग़ज़ल सुनाकर समां बांधा। रेनू शर्मा 'शब्द मुखर' ने स्त्री विमर्श की कविताएं सुनाई। सुमन जीत कौर, संध्या बक्शी, शिल्पी कुलदीप उपाधयाय ने भी सुंदर प्रस्तुति दी।

कार्यक्रम का संचालन कवयित्री प्रज्ञा श्रीवास्तव प्रज्ञाञ्जलि द्वारा अपने मनमोहक अंदाज से किया जिनका आज जन्म दिवस भी था । जन्म दिवस के दिन कवयित्री प्रज्ञा श्रीवास्तव प्रज्ञाञ्जलि ने तालियाँ बटोर अपने जन्म दिवस को यादगार बना लिया । अंत में कार्यक्रम की संजोयक शिवानी शर्मा द्वारा सभी उपस्थितजनों का आभार प्रकट कर समारोह का समापन किया गया ।

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