साहित्य (41)

साहित्य

जयपुर 14 सितम्बर। बोधि प्रकाशन की 'दीपक अरोड़ा स्मृति पांडुलिपि प्रकाशन योजना' के चौथे वर्ष में चयनित-प्रकाशित दो काव्य पुस्तकों का लोकार्पण बोधि सभागार में हुआ। योजना में चयनित कृतियों की रचनाकार अंजना टंडन एवं जोशना बैनर्जी को 'दीपक अरोड़ा स्मृति सम्मान-2019 प्रदान किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ कवि एवं दूरदर्शन के पूर्व निदेशक श्री कृष्ण कल्पित थे एवं अध्यक्षता प्रसिद्ध कथाकार तथा जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. सत्यनारायण ने की। कार्यक्रम का संयोजन फिल्मकार और प्रतिष्ठित लेखक श्री अविनाश त्रिपाठी ने किया। दिल्ली से पधारे कवि एवं आलोचक रवीन्द्र कुमार दास ने दीपक अरोड़ा के रचनाकर्म पर विस्तार से चर्चा की। योजना के निर्णायक मंडल के सदस्य गोविन्द माथुर ने पांडुलिपियों की चयन प्रक्रिया पर अपना वक्तव्य दिया। मुख्य अतिथि कृष्ण कल्पित ने कवि दीपक अरोड़ा को याद करते हुए कहा कि वे बेहद प्रतिभावान कवि थे। उनका असमय चले जाना साहित्य की क्षति है। उन्होंने चयनित पुस्तकों पर अपनी पारखी टीप भी दी। कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ. सत्यनारायण ने चयनित पुस्तकों की दोनों रचनाकारों को बधाई दी एवं आशीर्वचन कहे। अतिथि कवियों के शानदार काव्य पाठ के साथ आयोजन का समापन हुआ। दीपक अरोड़ा की कविताओं का पाठ बनवारी कुमावत 'राज' ने किया। बोधि प्रकाशन की ओर से मायामृग ने सभी का आभार व्यक्त किया।

दीपक अरोड़ा स्मृति पांडुलिपि प्रकाशन योजना-2019 के तहत चयनित सुश्री अंजना टंडना की पुस्तक कैवल्य और सुश्री जोशना बैनर्जी आडवानी की पुस्तक सुधानपूर्णा का प्रकाशन किया गया है। इन पुस्तकों का लोकार्पण एवं रचनाकारों का सम्मान समारोह दिनांक 14 सितम्बर 2019 को अपराह्न 2 से 4 बजे बोधि सभागार, बोधि प्रकाशन, सी-46, सुदर्शनपुरा इंडस्ट्रियल एरिया मेन रोड, बाईस गोदाम, जयपुर में आयोजित होगा। संस्था की मीडिया प्रभारी शिवानी शर्मा ने बताया कि दीपक अरोड़ा स्मृति पांडुलिपि प्रकाशन योजना बोधि प्रकाशन की एक महत्वपूर्ण योजना है। ये इस योजना का चौथा वर्ष है । दीपक अरोड़ा एक प्रतिभाशाली कवि- जिन्हें कविता तो बहुत मिली पर उम्र बहुत कम। अल्पायु में उनका जाना, कविता के एक नये तेवर का असमय ठहर जाने जैसा है। उनकी कविताएं, जिनमें बहुधा पंजाबी मुहावरे वाली मारक शक्ति है- एकदम अलग ज़मीन पर कही गई हैं। खास बात ये कि वे अपनी ज़मीन खुद तैयार करते हैं, और उसमें प्रेम की पौध भी वे स्वयं लगाते हैं। यह पौध पुष्पित होगी, इसमें संदेह नहीं। 'वक्त के होंठों पर एक प्रेमगीत', 'समुन्दर इन दिनों' और 'अंतिम वार्ता के अवशेष' दीपक अरोड़ा के प्रकाशित कविता संग्रह हैं। दीपक की स्मृति को अक्षुण्ण रखने के बहुविध कार्यक्रमों के साथ ही 'दीपक अरोड़ा स्मृति पांडुलिपि प्रकाशन योजना' आरंभ की गई है। इसके तहत उन रचनाकारों से पांडुलिपियां आमंत्रित की जाती हैं, जिनकी अब तक किसी भी विधा में कोई स्वतंत्र पुस्तक प्रकाशित न हुई हो। ऐसा करने के पीछे भाव यह कि 'पहली पुस्तक की खुशी' इस योजना के माध्यम से रचनाकार को मिले। इस योजना के तहत पूर्व में प्रकाशित पुस्तकें इस प्रकार हैं- 2016 : जामुनी आंखों वाली एक लड़की और जेठ के बादल (अमित आनंद), पत्थरों के देश में देवता नहीं होते (अर्चना कुमारी), चांदमारी समय (अस्मुरारी नंदन मिश्र), अयोध्या और मगहर के बीच (कर्मानन्द आर्य), आवाज़ भी देह है (संजय कुमार शांडिल्य)। 2017 : पुनपुन और अन्य कविताएं (प्रत्यूष चन्द्र मिश्रा), मैं तुम्हें लिखना चाहूं अगर (प्रियंका वाघेला)। 2018 : गेहूं का अस्थि विसर्जन व अन्य कविताएं (अखिलेश श्रीवास्तव), तीसरी कविता की अनुमति नहीं (सुदर्शन शर्मा) प्रकाशित हुईं। इस वर्ष (2019)- 'कैवल्य' (अंजना टंडन), 'सुधानपूर्णा (जोशना बैनर्जी आडवानी) योजना में प्रकाशनार्थ चुनी गई हैं। प्रतिवर्ष कम से कम दो कविता-पांडुलिपियां चयनित किया जाना प्रस्तावित है। योजना के संबंध में कोई दावा या बड़ा वादा नहीं है। प्रयास रहेगा कि कुछ और अच्छी पुस्तकें इस योजना के बहाने से प्रकाशित हों। पांडुलिपि आमंत्रित किए जाने के समय से ही हमारा यह स्पष्ट मत था कि यहां किसी प्रकार से कवियों को श्रेष्ठतर या हीनतर मानने का भाव नहीं होगा। केवल अपनी सीमाओं के तहत चयन का प्रयास किया जाएगा। यह रेखांकित करना जरूरी है कि योजना का परिणाम तैयार करते समय किसी संग्रह को 'रिजेक्ट' करने का दंभ नहीं रहा। प्रकाशन की योजना केवल अपेक्षित संख्या में संग्रह चयनित करने की थी, निर्णायकों ने अपने विवेक से जो चुने, वे इस योजना में शामिल किए गए। ऐसा करने में बहुत अच्छी कविताओं के संग्रह भी छूट गए हो सकते हैं, इसे योजना और आयोजकों की सीमा ही माना जाना चाहिए; रचना या रचनाकार की कमी नहीं। इस योजना में पांडुलिपि भेजने वाले सभी रचनाकारों, योजना के पिछले वर्षों में निर्णायक रहे— सुधा अरोड़ा, डॉ. जीवन सिंह, मनोज छाबड़ा, ओमपुरोहित 'कागद', अर्चना वर्मा, नन्द भारद्वाज, निरंजन श्रोत्रिय, डॉ. पद्मजा शर्मा, मृदुला शुक्ला, अरुण देव, मणि मोहन, विनोद पदरज और इस वर्ष के निर्णायकगण अनामिका, ध्रुव गुप्त, गोविन्द माथुर, रुचि भल्ला। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ कवि एवं दूरदर्शन के पूर्व निदेशक कृष्ण कल्पित होंगे एवं अध्यक्षता प्रसिद्ध कथाकार तथा जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. सत्यनारायण करेंगे। कार्यक्रम का संयोजन फिल्मकार और प्रतिष्ठित लेखक अविनाश त्रिपाठी करेंंगे।

जयपुर // प्रख्यात कवि एवं लेखक कर्नल अमरदीप की चर्चित दो पुस्तकें ‘मेरी उम्र की महिलाएँ’ (काव्य संग्रह) और ‘मुसाफ़िरनामा’ (अपने समय का लेखा) का लोकार्पण, जयपुर के सुदर्शनपुरा स्थित बोधि प्रकाशन सभागार में प्रवीण नाहटा की अध्यक्षता, कवियित्री और चित्रकार सुश्री अंजना टंडन एवं अजीतगढ़ के आशीष शर्मा खाण्डल के मुख्य आतिथ्य द्वारा भव्य गरिमामय आयोजन में सम्पन्न हुआ। इस आयोजन में जयपुर के नामचीन रचनाकार, कवि, सैनिक परिवारों के सदस्य व साहित्य प्रेमी इस आयोजन के साक्षी बने । कर्नल अमरदीप की यह पुस्तके बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित हुई हैं 

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‘मेरी उम्र की महिलाएं’ लेखक का चौथा कविता संग्रह है और ‘मुसाफिरनामा’ इसी नाम से लिखे जा रहे समसामयिक विषयों के स्तम्भ का संकलन है कर्नल अमरदीप की इस पुस्तक में यह मालूम पड़ता है यदि व्यवस्था में लय हो तो बहुत सारी समस्याएं हल हो सकती हैं। मगर इस लय को लाने के लिए बहुत त्याग, बलिदान करना होता है।

सामाजिक और राजनैतिक सरोकारों को साहित्य से जोड़कर समाज में चेतना लाने के लिए सक्रिय कर्नल अमरदीप की यह पुस्तक पाठको को बहुत रोचक लगेगी पुस्तक का आकर्षक चित्रांकन, कार्टून और रेखाचित्र जन टीवी के कार्टूनिस्ट कमल किशोर ने किया है।

इस अवसर पर दोनों पुस्तकों के किन्डल संस्करण का भी लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम का शानदार संचालन लेखिका और कवयित्री शिवानी शर्मा ने किया एवं अंत मे बोधि प्रकाशन के कवि एवं प्रकाशक मायामृग ने सभी अतिथियों, कार्यक्रम में उपस्थित सभी आगुन्तको का आभार प्रकट किया.

 

 

जयपुर//आज जयपुर स्थित प्रेस क्लब के मुख्य सभागार में आयोजित एक भव्य समारोह में अखिल भारतीय डॉ कुमुद टिक्कू कहानी प्रतियोगिता में जयपुर की शिवानी शर्मा को श्रेष्ठ कहानी के सम्मानित किया गया। 
 
इस अवसर पर साहित्य जगत की नामचीन हस्तियां ममता कालिया, चंद्रकांता, प्रोफेसर पवन सुराणा, डॉ सुदेश बत्रा, नीलिमा टिक्कू, देवर्षि कलानाथ शास्त्री, नंद भारद्वाज एवं दुर्गा प्रसाद अग्रवाल की गरिमामई उपस्थिति रही ।
 
उपस्थित अतिथियों ने शिवानी शर्मा को पुष्पाहार एवं शाल पहना कर, प्रशस्ति पत्र एवं दो हज़ार रुपए की राशि पुरस्कार स्वरुप प्रदान कर सम्मानित किया गया ।
 
 
प्रसिद्ध साहित्यकार नीलिमा टिक्कू अपनी सासु मां की स्मृति में प्रति वर्ष साहित्य की किसी एक विधा पर ये प्रतियोगिता आयोजित करती हैं। स्पंदन संस्था के माध्यम से नीलिमा ने साहित्य सेवा और साहित्यकारों को पुरस्कृत एवं सम्मानित करने का जो बीड़ा उठाया है वो अतुलनीय है समस्त साहित्य जगत नीलिमा टिक्कू की इस  साधना को नमन करते हुए इस प्रोत्साहन के लिए आभार प्रकट करता हैं।
 
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हस कर बोली वह
अजी रहने दो यह रोज रोज की
दिल टूटने की बातें
देख चुकी हूं मैं......
सोनोग्राफी में तुम्हारा साबुत दिल
जोर जोर से
उछलता हुआ।

दिल पर दरारें पड़ गई
तुम्हारे व्यगं बाणों से
यकीन न हो तो देख लो
यह लाल पीली रेखाएं
ई.सी.जी. की

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सोचे बैठे थे
कब का टुकडे टुकड़े हो गया
हैरत हुई स्क्रीन पर
दिल को साबुत देख कर।

शशि पाठक
बरकतनगर जयपुर

बच्चों को स्कूल छोड़ कर सुमित्रा जल्दी से वर्मा आटीं के घर पहुंची !
क्या बनाऊं आटीं जी?
चने की दाल और आलू मेथी बना लो !
उस ने देखा मेथी की गुच्छी किचन में पड़ी थी ! वह दाल चढा कर उसे साफ करने लगी ! मन में तो आया कहे----आटीं जी, हरी सब्जी तो आप साफकर के रख दिया करो बहुत टाईम लग जाता है पर पता था अगर कह दिया तो जवाब मिले गा-----तो फिर बना भी मैं ही लिया करुगी ! टाईम लगता है तो पैसे किस बात के लेती हो? इस लिए वह चुपचाप मेथी साफ करती रही !
यहां से निकल कर गुप्ता आटीं के पहुचना है ! वहां ज्यादा काम नहीं है ! दो बुजुर्ग लोग हैं, जो बना दो चुपचाप खा लेते हैं ! पर परेशानी तो माथुर आटीं के होती है,, दाल चावल रोटी सब्जी रायता सब बनता है ! कहने को तो तीन ही लोग हैं पर पसंद सब की अलग अलग है ! साहब को लौकी पसंद है तो मेमसॉब को मटर और छोटे साहब यह दोनो ही नहीं खाते , उन के लिए गोभी बनाई !
बाई ,भैया के लिए थाली लगा दो !
थाली लगा कर उस ने टेबल पर रखी दाल चावल गोभी रोटी रायता और सलाद
छोटे साहब ने एक कौर मुह में डाला और थाली सरका दी-----कितना बेकार खाना है !मुझे नही खाना !
अरे, बाई जरा ध्यान से बनाया करो ! ले जाओ थाली और बेटे को मैगी बना दो !
इस थाली का क्या करू आटीं ? डस्टबिन में डाल दो और क्या करोगी !

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बड़े दुखी दिल से उस ने थाली डस्टबिन में उल्टी और मैगी बनाने लगी !
यहां से निकल कर वह जल्दी जल्दी कदम बढाती हुई अपने घर पहुंची ! बच्चे दरवाजे पर ही मिल गये ------
मम्मी ,कितनी देर कर देती हो ! भूख लगी है जल्दी खाना दो !
बस अभी लो---और वह जल्दी जल्दी सिल बट्टे पर चटनी पीसने लगी ! छोटा बेटा ठुनक कर बोला----रोज रोज चटनी रोटी दे देती हो ! कभी सब्जी भी तो बनाया करो !
हां कल जरूर बना दूंगी बेटा ,आज देर हो रही है ना ! उस की आखों के सामने डस्टबिन में उल्टी परसी हुई थाली कौंध गई ! तीन घरों में खाना बना कर वह मुश्किल से कमरे का किराया और बच्चौ की फीस दे पाती हैै ,सब्जी के लिये पैसे ही नहीं बचते यह बात वह अपने मासूम बच्चों को कैसे समझाये ! उस की आखों के सामने फिर परसी थाली घूम गई जो उस ने डस्टबिन में उल्टी थी और आखं से आंसू टपक गया जिसे उस ने बच्चों से छिपा कर पोंछ लिया !

शशि पाठक
बरकतनगर जयपुर

  • जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    पलकों का ख्वाब बनकर
    नील गगन तले
    पंख पसारे उड़ने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    कान्हा की बांसुरी का
    मनमोहक मादक स्वर बन
    सृष्टि के कण-कण में
    मुझको भी रचने बसने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    विहंग कलरव से
    गुंजित उपवन की
    मनमोहक आभा बन
    मुझको भी झलकने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    सिंधु के निर्मल नीर की
    धारा का प्रवाह बन
    मुझको भी प्रवाहित होने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    वैध्वय की पीड़ा का सोलह श्रृंगार बन
    दुल्हन सा सतरंगी चुनरिया का
    ताना-बाना बुनने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    पर्वतराज हिमालय के
    शिखर के ताज का गुमान बन
    मुझको भी चमकने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।
    मां के वात्सल्य के अंक में
    स्पर्श के सुख से
    मुझको भी आह्लादित होने दो ।
    जग मुझको ही रमने दो
    मनुष्य के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    मां बाप के नयनों की ज्योति बन
    जीवन पथ पर
    कदम से कदम मिलाकर
    मुझको भी चलने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    स्वयं को मानसिक
    रूठिवादिता से मुक्त कर
    स्वच्छंता का माहौल
    भारत में भी पनपने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    बेटियां होती है बेटों से कम नहीं
    अब सहेंगे कोई जुर्म नहीं
    भारत का गौरव बन
    हमको भी जीने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।

    उर्मिला.के.मोसलपुरी
    पाली- मारवाड़  

 

आज न दिखती कहीं
परिवार की एकता -----
जो थी शान ,
और पहचान ,
जो थी अवलम्बित स्वहित के त्याग पर
आज मानव त्याग भूल खुद के सुख को ढूँढ रहा ----
धीरज खो देता पल भर में , नहीं चाहता सुनना किसी को --
सभी अपनी सुनाने में लगे हैं , जिससे परिवार बिघटित हो रहे ,,,
पीढ़ी का अंतर , बना रहा संबंधों में तकरार ----
खत्म हो रहे आपस के प्यार ---

 

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बाबा दादी का न चाहिए अब किसी को दुलार,,
और न vvvही परिवार के प्रेम की बौछार ---
आज सब व्यस्त हैं , खुद में ही मस्त हैं ,,
दूर रहना चाहते रोका टोकी से -----
इसलिए बनाते आशियानें इतनी दूर ,,
रहते खुद में ही मशरूफ ---
दिन पर दिन है परिवार टूटता ---
एक बार टूटना शुरू होने पर फिर न जुटता ---
आज की है समस्या बड़ी विकट ,
कोई न रखना चाहे किसी को निकट ---
एक दिन फिर ऐसा भी )आएगा
परिवार के नाम का बस अवशेष रह जाएगा -----
हम इतिहास में ही पढ़ पायेंगे ---
और किताबों से ही बड़े परिवार
की अवधारणा का पता लगा पाएँगे ---

सीमा "मधुरिमा"
लखनऊ (उत्तर प्रदेश )

हे याज्ञसेनी, हे अग्निगर्भा, तुम एक विल-क्षण नारी थी

पर इतिहासों के पृष्टो पर, बस ताड़ना की अधिकारी थी

 

ना  जन्म लिया  देखा बचपन, ना  देखा नन्हा सा क्रंदन

 अद्भुत  यज्ञ  था शुचि अनल ,युवति बन तुमने लिया जन्म

 

फिर लक्ष्य प्राप्ति हेतु तुमने, था किया  खुद को आहुति सखी

क्या मन में  उपजी नहीं व्यथा, क्या क्षोभ जरा भी नहीं हुआ

 

जिसको था प्रेम किया  मन से,ना  उसको पाया पूर्ण रूप

कैसे तुमने सह ली पीड़ा ,क्या है रहस्य तुम क्यों अनूप

 

हे सखी तुम स्वयं नारी  हो, तुम मेरे  मन को जानोगी 

एक बात मैं कहती हूँ तुमसे, तुम निश्चित उसको मानेगी

 

अग्नि की गोद से जन्मी मैं, एक लक्ष्य पिता का साथ लिए

मैं याज्ञसेनी आयी जग में , दायित्वों का संताप लिए

 

विदूषी थी जाना था मैंने, किस कारण जग में  आई थी

लज्जित कर दे जो कल्पना को  ,वो रूप शिखा भी पायी थी

 

पर थी नारी  ही मैं भी तो, इस मन पे मेरा कहा बल था

जो दिखा सदा ही इस जग को, माया थी वो बस एक छल  था

था पंच-पति को वरन किया , मैं कहलाती हूँ पांचाली

पीड़ा  से फिर भी कभी कभी, पाती थी खुद को बस खाली

 

एक समर हुआ कुरुभूमि में , सौ समर थे मैंने खुद से लडे

हर समर में  मैं जय हो पायी ,थे सखा रूप मैं कृष्णा खड़े।

 

सौभाग्य मेरा दुर्भाग्य बना, वो बाजी थी एक चौसर की

दुर्योधन मन तो प्रतीक्षित था ,कई समय से ऐसे अवसर की

 

जो पंच पति परमेश्वर थे ,जो योद्धा थे प्रलयंकारी

वो झुका के मस्तक बैठे थे, स्तब्ध थी कुरुसभा सारी

 

वो पार्थ कि  जिनके बाणो में , साक्षात् यम की दावाग्नि थी

निर्वीर्य बने वो बैठे थे, लज्जित होती अर्धांगनी थी

 

उस कुरुसभा मैं खड़ी थी मैं, कुलवधू थी मैं उस कुरुकुल की

सारे मेरे थे स्वजन  वहां ,फिर भी भय से मैं आकुल थी

 

हो दग्ध वासना से खुद की ,दुर्योधन मन उन्मादित था

मेरी इस क्षीण दशा को देख, हर दुष्ट हृदय आह्लादित था

 

जब दुशासन के हाथ बढ़े , हरने को मेरा चीर  सखी

वह रोष ,क्रोध, अपमान, व्यथा ,थी चरम परिध पे पीर सखी

 

जग से हारी ,प्रेम से हारी ,पर भावना  को संवरण किया 

उन अश्रुसिक्त नैनो को भींच, मैंने माधव का स्मरण किया 

 

ये अभ्यंकर हे दया निधि, आओ मन मैं आहवान किया 

उस श्याम सलोनी मूरत का ,अश्रुजल से आचमन किया 

 

उसके आगे की गाथा का है, बस इतना ही सार सखी

परमेश्वर गर है साथ तेरे ,निश्चित है तम की हार सखी

 

पर छिन्न भिन्न था हृदय मेरा, इतने थे मन मैं शूल गड़े

हर समर मैं मैं जय हो पायी, थे सखा रूप मैं कृष्णा खड़े

 

जब जब दुविधा मैं मन था मेरा ,या दम्भी कुछ आचरण था मेरा

के-शव को सम्मुख पाती थी, हर वेदना बस टल  जाती थी

 

वो पार्थ सारथि थे रण में ,और निश्चित विजय कराई थी

मैंने जीवन की  सीख सभी, फिर  योगेश्वर   से पायी थी

 

जो राधा के प्रियतम थे सांवरे ,सौभाग्य रुक्मणि पायी थी

 मैं मन से कृष्ण को अर्पण थी, और कृष्णा मैं कहलायी थी

 

 वो अचल अजेय वो आदि देव, वो थे मेरे संग मैं सदैव

मेरे नीर में  थे, मेरी पीर में थे , मेरे केशो में,  मेरे चीर में  थे

 

जब जब जग ने अपमान किया , मेरे सखा ने मुझ को थाम लिया

मेरे नयनो के हर इक अश्रु को, मोहन ने खुद का मान लिया

 

वो माधव जो अपने मुख मैं त्रैलोक्य समाया करते थे

वो सहचर बन संग थे मेरे ,रूठू  तो मनाया करते थे

 

वो मुरली धर जिनकी धुन सुन, सुध बुध गोपिया खोती थी

वो मेरे पथ के प्रदर्शक थे ,निशदिन गोष्ठिया होती थी

 

वो मार्ग भी थे ,वो लक्ष्य भी थे, वो लक्ष्य प्राप्ति का साधन भी

वो पूजा भी, परमेश्वर भी ,वो नर भी ,वो नारायन  भी

 

मेरे क्रोध में  थे, मेरे बोध में  थे, मेरी दुविधा में ,आमोद में  थे

हर शोध का वो परिणाम भी थे ,और हर परिणाम के शोध में  थे

 

मेरे हर प्रण में , जीवन रण में , कृष्णा के साथ थे कृष्ण लडे

हर समर में  मैं जय हो पायी, थे सखा रूप मैं कृष्णा खड़े

 

लेखिका
श्रीमती शिखा जे पचौली
सहायक प्रोफेसर , कंप्यूटर इंजीनियरिंग विभाग
एआईएसएसएमएस कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग
पुणे (महाराष्ट्र )

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