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राष्ट्रीय पुस्तक मेला लखनऊ द्वारा सम्मानित हुई सुनीता अग्रवाल की लघु कथा "नयी सोच"
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लखनऊ// सोलहवां राष्ट्रीय पुस्तक मेला लखनऊ द्वारा आयोजित ऑनलाइन कांटेस्ट में लखनऊ की लेखिका श्रीमती सुनीता अग्रवाल की कहानी "नयी सोच" सर्वश्रेष्ठ लघु कथा के रूप में चुनी गयी ।
सोलहवां राष्ट्रीय पुस्तक मेला के समापन समारोह पर लखनऊ में आयोजित भव्य समारोह में लेखिका श्रीमती सुनीता अग्रवाल को, मेयर संयुक्ता भाटिया ने सम्मानित किया ।


इस अवसर पर स्वरूप कुमारी बख्शी, सुधा, प्रख्यात लेखिका अलका प्रमोद ,हिंदी संस्थान की संपादक अमिता दुबे आदि उपस्थित थे ।
लेखिका श्रीमती सुनीता अग्रवाल की पुरस्कृत लघु कथा "नयी सोच"

 

"सुन सुरभि, आज रिया का प्लेसमेंट हो गया है,पुणे की एक अच्छी कंपनी में 8 लाख का पैकेज मिला है, आ रही है तेरे पास।" "अरे वाह दी! यह तो बहुत अच्छी खबर सुनाई है आपने, मुबारक हो।" "तुझे भी,पर रिया का कहना है दो साल तक शादी की कोई बात न करें उससे।" यह कहते हुए थोड़ी चिंतित सी लगी मुझे वसुधा दी। "कोई बात नही दी, अब हम लोगों का जमाना नही रहा, अच्छा है नौकरी का अनुभव भविष्य में काम ही आयेगा,जब इतनी पढ़ाई की है तो उसका लाभ भी उठाने दीजिये,अब आत्म -निर्भरता समय की मांग है।" चूँकि रिया को बता दिया गया था कि वह घर में सबसे बड़ी है,इसलिए जो भी फैसले ले सोच समझ कर लें।रिया कुछ दिन मेरे पास रही फिर कम्पनी के पास ही एक पी०जी०में शिफ्ट हो गयी।

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समय तेजी से बीता, देखते ही देखते तीन साल बीत गये। रिया अपने घर की बेहद खूबसूरत,लाडली और हँसमुख बेटी थी। काफी देख परखकर स्मार्ट समर को रिया के लिए पसंद किया गया।पूरे उत्साह और खुशी के साथ रिया की विदाई सम्पन्न हुई। लेकिन कहते है न....जन्म लेने के साथ ही आपके सम्पूर्ण जीवन का प्रारूप निश्चित हो चुका होता है,आपकी खुशियों की नींव वक़्त की ईट पर टिकी होती है और किस्मत की लकीरें हमारे सौभाग्य को दुर्भाग्य में बदलने की ताक़त रखती है। समर की माँ मन ही मन रिया की नौकरी के खिलाफ थी उन्होंने रिया के दोस्तों के खिलाफ समर के कान भरने शुरू कर दिये थे। धीरे धीरे शक ने उनके प्यार के बीच एक माक़ूल जगह बना ली थी।एक दिन बात लड़ाई झगड़े से ऊपर उठ गयी और समर ने रिया पर हाथ उठा दिया,"माँ ठीक कहती है जॉब करने वाली लड़कियों का कोई चरित्र नही होता,अब तुम्हारे सामने दो ही रास्ते है जॉब छोड़ो या घर छोड़ दो ।" ‎इन शब्दों की चोट ने रिया के टूटे हुए मन को और भी बिखेर कर रख दिया।आंख भर आयी थी उसकी.. रुंधे हुए मन से अपने डेढ़ साल के वैवाहिक जीवन को बैग में पैक किया और मेरे पास चली आयी। ‎

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एकाएक रिया को यूं आया देखकर मैं चौक गयी । सब कुछ जानने के बाद उसे समझाते हुए बोली,"कभी कभी धैर्य और खामोशी से भी हालात सुधर सकते है अब वह ही तुम्हारा घर है शादी हुई है कोई मज़ाक नही...ऐसे रिश्ते खत्म नही होते..हम लोगों को देख ,इतने साल हो गये,गृहस्थी में उतार चढ़ाव आते ही रहते है,इतनी सी बात पर कोई घर छोड़ता है क्या?" ‎"इतनी सी बात ? मौसी यह इतनी सी बात नही है,क्या सभी लड़कियां जो आज घर से दूर जॉब कर रही है गलत है? क्यों करेक्टर के सर्टिफिकेट पर हमें पुरुषों की मोहर चाहिए? मैं आप से ही पूछती हूं, इतने साल आपने अपने घर को समर्पित किये है ...क्या है आपका अपना...फैसले लेने का हक़ भी नही है आपको..बताइये? ‎एक पल को कोई जवाब देते नही बना शायद मर्यादाओं और मूल्यों के इर्द गिर्द सिमटा हमारा वजूद कभी ये सोच ही नही पाया कि जब तक औरत खुद को पहचाने,उम्र की हथेली से वक़्त की धूप फिसल चुकी होती है। फिर भी शादी की अनिवार्यता को समझते हुए इतना ही पूछ पायी,"क्या सोचा फिर...आगे क्या करना है?" ‎अब ज़माना बदल रहा है मौसी,प्यार के साथ औरत अपने पति का विश्वास भी चाहती है तन मन से समर की हो चुकी थी पर यह अपमान नही सहूँगी, क्या जॉब छोड़ देने से सब कुछ पहले जैसा हो जायेगा? नही न.....एक बार अपने होने का अर्थ जान लेने के बाद मुझे अपने लक्ष्य की कन्दीलें साफ दिख रही है, मेरा अस्तित्व बेडरूम में बिछा कोई पावदान नही है , मैंने भी अपनी आंखों में खुशनुमा सपने सजाएं थे, ज़िन्दगी एक ही बार मिलती है और मैं अपनी ज़िन्दगी को खुश रहने का एक और मौका ज़रूर दूंगी।पर समर के साथ अब नही......।" ‎एक ही साँस में जैसे बोल पड़ी थी रिया।शायद आज के समय की ये सोच थी यह सब सुनना मेरे अपने विचारों से परे था पर भला लगा। अनायास ही मैं मुस्कुरा उठी थी। एक नये बदलाव के प्रति, एक नयी सोच....विवाह लड़कियों के जीवन का एक हिस्सा भर होना चाहिए,आधार नही। ‎अब मैं रिया के साथ खड़ी थी......

सुनीता अग्रवाल