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उर्मि की कलम से ..... " नन्ही परी की पुकार "

  • जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    पलकों का ख्वाब बनकर
    नील गगन तले
    पंख पसारे उड़ने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    कान्हा की बांसुरी का
    मनमोहक मादक स्वर बन
    सृष्टि के कण-कण में
    मुझको भी रचने बसने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    विहंग कलरव से
    गुंजित उपवन की
    मनमोहक आभा बन
    मुझको भी झलकने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    सिंधु के निर्मल नीर की
    धारा का प्रवाह बन
    मुझको भी प्रवाहित होने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    वैध्वय की पीड़ा का सोलह श्रृंगार बन
    दुल्हन सा सतरंगी चुनरिया का
    ताना-बाना बुनने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    पर्वतराज हिमालय के
    शिखर के ताज का गुमान बन
    मुझको भी चमकने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।
    मां के वात्सल्य के अंक में
    स्पर्श के सुख से
    मुझको भी आह्लादित होने दो ।
    जग मुझको ही रमने दो
    मनुष्य के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    मां बाप के नयनों की ज्योति बन
    जीवन पथ पर
    कदम से कदम मिलाकर
    मुझको भी चलने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    स्वयं को मानसिक
    रूठिवादिता से मुक्त कर
    स्वच्छंता का माहौल
    भारत में भी पनपने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।
    बेटियां होती है बेटों से कम नहीं
    अब सहेंगे कोई जुर्म नहीं
    भारत का गौरव बन
    हमको भी जीने दो ।।
    जग मुझको भी रमने दो
    मनुज के सांचे में
    मुझको भी ढलने दो ।।

    उर्मिला.के.मोसलपुरी
    पाली- मारवाड़