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शशि पाठक जयपुर की कलम से लघु कथा ''मजबूरी''

बच्चों को स्कूल छोड़ कर सुमित्रा जल्दी से वर्मा आटीं के घर पहुंची !
क्या बनाऊं आटीं जी?
चने की दाल और आलू मेथी बना लो !
उस ने देखा मेथी की गुच्छी किचन में पड़ी थी ! वह दाल चढा कर उसे साफ करने लगी ! मन में तो आया कहे----आटीं जी, हरी सब्जी तो आप साफकर के रख दिया करो बहुत टाईम लग जाता है पर पता था अगर कह दिया तो जवाब मिले गा-----तो फिर बना भी मैं ही लिया करुगी ! टाईम लगता है तो पैसे किस बात के लेती हो? इस लिए वह चुपचाप मेथी साफ करती रही !
यहां से निकल कर गुप्ता आटीं के पहुचना है ! वहां ज्यादा काम नहीं है ! दो बुजुर्ग लोग हैं, जो बना दो चुपचाप खा लेते हैं ! पर परेशानी तो माथुर आटीं के होती है,, दाल चावल रोटी सब्जी रायता सब बनता है ! कहने को तो तीन ही लोग हैं पर पसंद सब की अलग अलग है ! साहब को लौकी पसंद है तो मेमसॉब को मटर और छोटे साहब यह दोनो ही नहीं खाते , उन के लिए गोभी बनाई !
बाई ,भैया के लिए थाली लगा दो !
थाली लगा कर उस ने टेबल पर रखी दाल चावल गोभी रोटी रायता और सलाद
छोटे साहब ने एक कौर मुह में डाला और थाली सरका दी-----कितना बेकार खाना है !मुझे नही खाना !
अरे, बाई जरा ध्यान से बनाया करो ! ले जाओ थाली और बेटे को मैगी बना दो !
इस थाली का क्या करू आटीं ? डस्टबिन में डाल दो और क्या करोगी !

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बड़े दुखी दिल से उस ने थाली डस्टबिन में उल्टी और मैगी बनाने लगी !
यहां से निकल कर वह जल्दी जल्दी कदम बढाती हुई अपने घर पहुंची ! बच्चे दरवाजे पर ही मिल गये ------
मम्मी ,कितनी देर कर देती हो ! भूख लगी है जल्दी खाना दो !
बस अभी लो---और वह जल्दी जल्दी सिल बट्टे पर चटनी पीसने लगी ! छोटा बेटा ठुनक कर बोला----रोज रोज चटनी रोटी दे देती हो ! कभी सब्जी भी तो बनाया करो !
हां कल जरूर बना दूंगी बेटा ,आज देर हो रही है ना ! उस की आखों के सामने डस्टबिन में उल्टी परसी हुई थाली कौंध गई ! तीन घरों में खाना बना कर वह मुश्किल से कमरे का किराया और बच्चौ की फीस दे पाती हैै ,सब्जी के लिये पैसे ही नहीं बचते यह बात वह अपने मासूम बच्चों को कैसे समझाये ! उस की आखों के सामने फिर परसी थाली घूम गई जो उस ने डस्टबिन में उल्टी थी और आखं से आंसू टपक गया जिसे उस ने बच्चों से छिपा कर पोंछ लिया !

शशि पाठक
बरकतनगर जयपुर