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शशि पाठक जयपुर की कलम से लघु कविता ''दिल''

हस कर बोली वह
अजी रहने दो यह रोज रोज की
दिल टूटने की बातें
देख चुकी हूं मैं......
सोनोग्राफी में तुम्हारा साबुत दिल
जोर जोर से
उछलता हुआ।

दिल पर दरारें पड़ गई
तुम्हारे व्यगं बाणों से
यकीन न हो तो देख लो
यह लाल पीली रेखाएं
ई.सी.जी. की

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सोचे बैठे थे
कब का टुकडे टुकड़े हो गया
हैरत हुई स्क्रीन पर
दिल को साबुत देख कर।

शशि पाठक
बरकतनगर जयपुर