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सीमा "मधुरिमा" लखनऊ की कलम से लघुकथा "उफ़्फ़फ़फ़ ये अप्सराएँ"


"हद्द है जाने क्या समझती हैं खुद को .....
अब इन्हें लाभ भी चाहिए और बदले में कुछ देना भी नहीं ....
न इनसे पैसा लो न ये हाथ लगाने देंगी और तो और साला ये मि टू जाने क्या बला आ गया है ?
सब स्त्रियाँ हर समय उसी के बारे में बात करती रहती हैं . .....
त पूछ यार खुद को स्वर्ग से उतरी अप्सराएँ समझने लगी हैं ,"कहता जा रहा था विजय फोन पर अपने मित्र अप्रतिम से"


तभी उसकी नजर अखबार पर पड़ी जिसमें उसी के एक मित्र की गिरफ्तारी की खबर थी जिसने चार साल पहले अपने किसी सहयोगी को छुट्टियां देने के बदले शारीरिक शोषण किया था जिसने मि टू अभियान का हिस्सा बन उसके खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई थी .....
फिर तुमने क्या सोचा , अप्रतिम की आवाज उधर से आई "तुम्हारी उस अप्सरा को छुट्टी देनी है या नहीं''
"कुछ नहीं बाद में बात करते हैं "
बोल विजय ने फोन रख दिया, .उसका हलक सूखा जा रहा था !

सीमा "मधुरिमा"
लखनऊ